मौलिक अधिकार या मूल अधिकार | Fundamental Rights - BHARAT GK

26 December 2018

मौलिक अधिकार या मूल अधिकार | Fundamental Rights

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मौलिक अधिकार | Fundamental Rights

भारतीय संविधान के भाग - 3 और अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक मौलिक अधिकार का वर्णन है। इसलिए भाग 3 को 'मूल अधिकारों का जन्मदाता' एवं 'भारत का अधिकार पत्र' कहा जाता है। मौलिक अधिकार का विकास ब्रिटेन में हुआ। वहां के सम्राट किंग जॉन ने 1215 में जनता को एक अधिकार पत्र (Megna Carta) दिया। 1688 में जेम्स II के समय इंग्लैंड में गौरवपूर्ण क्रांति हुई और 1689 में संविधान की सर्वोच्चता स्थापित हुई साथ ही बिल ऑफ राइट्स हस्ताक्षर हुआ।
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1789 की फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात वहां की जनता के लिए मौलिक अधिकार की घोषणा की गई। फ्रांस के पश्चात अमेरिका में 1791 में 10वां संविधान संशोधन करके संविधान में मूल अधिकार को सम्मिलित किया गया। अमेरिका का संविधान 1787 में बना और 1989 में लागू हुआ। वहां के मूल संविधान में मौलिक अधिकार नहीं था। भारतीय संविधान में 'मौलिक अधिकार' संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है।
भारत में सर्वप्रथम मौलिक अधिकारों की मांग बाल गंगाधर तिलक ने 'संविधान विधेयक 1895' के माध्यम से किया। 10 अगस्त 1928 को नेहरू रिपोर्ट की घोषणा की गई थी। उस रिपोर्ट में मौलिक अधिकार से संबंधित 19 अनुच्छेदों को लागू किया गया। मौलिक अधिकार अथवा मूल अधिकार का प्रारूप पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बनाया था।
1931 में कांग्रेस का का विशेष अधिवेशन सरदार पटेल की अध्यक्षता में कराची में हुई। इस अधिवेशन में पहली बार मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य संबंधी विधेयक को सम्मिलित किया गया। कैबिनेट मिशन के सुझाव पर सरदार बल्लभ भाई पटेल ने एक सलाहकार समिति का गठन किया। सलाहकार समिति ने मौलिक अधिकार से संबंधित दो उप समितियां बनाई।
  • मौलिक अधिकार उपसमिति 
  • अल्पसंख्यक उपसमिति
मौलिक अधिकार उप समिति के अध्यक्ष जे बी कृपलानी तथा अल्पसंख्यक उप समिति के अध्यक्ष एच सी मुखर्जी थे। मौलिक अधिकार उप समिति के सिफारिश पर सात मौलिक अधिकार को संविधान में सम्मिलित किया गया। 1978 में जनता पार्टी की सरकार ने 44वां संशोधन कर 'संपत्ति के अधिकार' को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया। जिससे अनुच्छेद 31 का लोप हो गया। इसे अनुच्छेद 300 (A) और भाग 12 के 4 में रखा गया है। अब संपत्ति का अधिकार सिर्फ एक कानूनी अधिकार ही है। वर्तमान समय में छह मौलिक अधिकार है –
  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
  4. धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 से 28)
  5. शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 और 30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
अमेरिका तथा फ्रांस में मौलिक अधिकार को प्राकृतिक या नैसधिक अधिकार के नाम से जाना जाता है। इसका हनन नहीं किया जा सकता है। भारत में मौलिक अधिकार एक संविधान प्रदत्त अधिकार है। अनुच्छेद 358 के तहत अगर बाह्य आपात लागू हो तो मौलिक अधिकार से संबंधित अनुच्छेद 19 का निलंबन होगा। लेकिन यदि आंतरिक आपात लागू हो या सशस्त्र विद्रोह की भावना हो तो मौलिक अधिकार के सभी अनुच्छेदों का हनन होता था परंतु 44 वां संविधान संशोधन (1978) द्वारा यह प्रावधान किया गया की आंतरिक या बाह्य आपात होने पर भी अनुच्छेद 20 और 21 का हनन नहीं होगा।

1. समता या समानता का अधिकार

अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 तक  समता या समानता के अधिकार का वर्णन है।
अनुच्छेद 14  - राज्य का कानून सभी पर एक समान लागू होगा। ऊंच-नीच, गरीब-अमीर या किसी भी आधार पर पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 15 - राज्य जाति नस्ली धर्म लिंग जन्म स्थान आदि के आधार पर अपने नागरिकों के जीवन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा परंतु राज्य स्त्रीयों, बालकों एवं पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपबंध कर सकती है।
अनुच्छेद 16 - अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग को छोड़कर राज्य नियुक्ति हेतु किसी नागरिक से किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा। प्रत्येक आम नागरिक को अवसर की समानता होगी। अनुच्छेद 16 (4) के तहत राज्य अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े वर्गों और पिछड़े वर्गों पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाने हेतु आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 17 - इस अनुच्छेद के द्वारा अस्पृश्यता या छुआछूत का अंत किया गया। छुआछूत या अस्पृश्यता को दंडनीय अपराध की श्रेण में रखा गया है।
42वां संविधान संशोधन द्वारा अस्पृश्यता का नाम बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कर दिया गया। 1989 में राजीव गांधी पुनः इसका नाम अनुसूचित जाति-जनजाति कानून कर दिया।
अनुच्छेद 18 - इस अनुच्छेद के द्वारा सैन्य और शिक्षा को छोड़कर सारे उपाधियों को समाप्त कर दिया गया था। 1977 में जब जनता पार्टी आई तो सैन्य और शिक्षा की उपाधि को भी समाप्त कर दिया गया। पुनः 1980 में कांग्रेस सत्ता में आई और शिक्षा और सैन्य उपाधियों को प्रारंभ कर दिया गया।

2. स्वतंत्रता का अधिकार

अनुच्छेद 19 से अनुच्छेद 22 तक स्वतंत्रता के अधिकार के अधिकार के अधिकार का वर्णन है। पहले कुल 7 प्रकार की स्वतंत्रता का अधिकार था। 44 वां संविधान संशोधन द्वारा 19 (च) को समाप्त कर दिया गया। इसमें धन अर्जन संबंधित प्रावधान था।
अनुच्छेद 19 - अनुच्छेद 19 के तहत मूल संविधान में सात प्रकार की स्वतंत्रता का प्रावधान था, जो अब सिर्फ 6 रह गया है।
अनुच्छेद 19 (क) - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 19 (ख) - शस्त्र रहित शांतिपूर्वक एकत्रित होने व सभा सभा करने की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 19 (ग) - संस्था एवं संघ बनाने की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 19 (घ) - देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन या भ्रमण की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 19 (ङ) - देश के किसी भी भाग में निवास करने की स्वतंत्रता। अपवाद - जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर।
अनुच्छेद 20 (क) - इसमें वर्णन है कि अपराध के लिए तब तक कोई दोषी नहीं होगा, जब तक अपराध सिद्ध ना हो जाए।
अनुच्छेद 20 (ख) - किसी अपराधी को एक अपराध के लिए सिर्फ एक ही दंड की व्यवस्था है।
अनुच्छेद 20 (ग) - इसमें कहा गया है कि किसी भी अपराध के आरोपी को खुद के खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 21 इसके तहत किसी व्यक्ति को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार है। 86 वा संशोधन 2002 के साथ भाग 21 में (क) जोड़ा गया जिसमें प्रावधान है कि 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दिया जाए।
अनुच्छेद 22 - इस अनुच्छेद में व्यक्ति को तीन प्रकार का अधिकार  प्राप्त है।
  • पुलिस को गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को हिरासत में लेने का कारण बताना होगा।
  • हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटा (आने-जाने का समय छोड़कर) के अंदर न्यायालय में उपस्थित किया जाए।
  • हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील इसे कानूनी परामर्श लेने का अधिकार होगा।
यह अधिकार दो तरह के अपराधियों को नहीं दिया जाएगा।
  • शत्रु देश के निवासियों को।
  • निवारक निरोध अधिनियम के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को।
निवारक निरोध कानून - इसके तहत किसी व्यक्ति को अपराध करने से रोकने के लिए अपराध करने से पूर्व शंका के आधार पर गिरफ्तार किया जाता है।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार

अनुच्छेद 23 और अनुच्छेद 24 तक शोषण के विरुद्ध अधिकार का वर्णन है।
अनुच्छेद 23 - किसी व्यक्ति का क्रय-विक्रय नहीं किया जा सकता ना ही बेगार या जबरदस्ती काम करवाया जा सकता है। सिर्फ राष्ट्रीय सेवा हेतु व्यक्ति को बाध्य किया जा सकता है।
अनुच्छेद 24 - 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खानों कारखाना उद्योग व अथवा किसी प्रकार के जोखिम भरे कार्य नहीं करवाए जा सकता है।

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का वर्णन है।
अनुच्छेद 25 - इस अनुच्छेद के तहत भारत के नागरिक को किसी भी किसी भी धर्म को मानने और धर्म का प्रचार - प्रसार करने का अधिकार प्राप्त है। सिखों के द्वारा कृपाल रखना धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार रखना धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत आता है।
अनुच्छेद 26 - इस अनुच्छेद में धार्मिक संस्था की स्थापना और उसके संरक्षण का प्रावधान है।
अनुच्छेद 27 - इस अनुच्छेद के तहत धार्मिक कर नहीं लगाया जा सकता है।
अनुच्छेद 28 - इस अनुच्छेद में वर्णन है कि राजकीय विद्यालय में धार्मिक पढ़ाई नहीं होगी ना ही उन विद्यालय के छात्र-छात्राओं को धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने तथा कोई भी धर्मोपदेश सुनने के लिए निर्देश नहीं दिया जा सकता है।

5. संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार

अनुच्छेद 29 और 30 में संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार का वर्णन है।
अनुच्छेद 29 - इस अनुच्छेद में वर्णन है कि भारत के नागरिक के प्रत्येक वर्ग अपनी भाषा लिपि या संस्कृति संस्कृति को बनाए रख सकते हैं। किसी भी नागरिक को  राज्य द्वारा चलाई जाने वाली अथवा उससे सहायता प्राप्त किसी भी शिक्षण संस्थान में धर्म, मूल, वंश, जाति या भाषा के कारण प्रवेश से इनकार नहीं किया जा सकता है।
अनुच्छेद 30 - इस अनुच्छेद में वर्णन है कि भारत के अल्पसंख्यक वर्ग अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्थान का निर्माण कर सकते हैं और राज्य उस संस्थान को अनुदान देने में विभेद नहीं करेगी।
अनुच्छेद 31 - इस अनुच्छेद में संपत्ति के अधिकार का वर्णन था। जिसे 44 वां संविधान संशोधन द्वारा हटाकर 12 के 4 और अनुच्छेद 300 (क) में रखा गया है।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

अनुच्छेद 32 में संवैधानिक उपचारों के अधिकार का वर्णन है। इसमें वर्णन है कि मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकते हैं। अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में अपील किया जा सकता है। इस अधिकार के बिना मौलिक अधिकार का कोई वजूद नहीं है। इसलिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधानिक उपचारों के अधिकार को 'संविधान की हृदय' की संज्ञा दी है। जबकि प्रस्तावना को 'संविधान की कुंजी' कहा गया है। अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों की सुरक्षा हेतु सर्वोच्च न्यायालय पांच प्रकार की रिट जारी कर सकता है।
  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus)
  2. परमादेश (Mandamus)
  3. प्रतिषेध लेख (Prohibition)
  4. उत्प्रेषण (Certiorari)
  5. अधिकार पृच्छा लेख (Quo-warranto)
अनुच्छेद 33 के तहत संसद विधि बनाकर बलपूर्वक पुलिस बल, ब्यूरो तथा उच्च संगठनों पर नियंत्रण रख संगठनों पर नियंत्रण रख सकती है।
अनुच्छेद 34 के तहत यदि देश में सैन्य शासन लागू हो तो उस स्थिति में 359 के तहत मौलिक अधिकार का हनन होगा।
अनुच्छेद 35 के तहत भाग - 3 के उपबंधों को प्रभावित करने या विधान बनाने तथा निरस्त करने की शक्ति प्राप्त है।

मौलिक अधिकारों में संशोधन

मौलिक अधिकार तथा नीति निर्देशक सिद्धांत के बीच बीच संविधान निर्माण से ही विवाद चल रहा है। पहला संविधान संशोधन 1951 द्वारा शंकरी प्रसाद मामले में निर्णय लिया गया कि संसद मौलिक अधिकार में संशोधन कर सकती है। पुनः 1967 में गोरखनाथ मामले में निर्णय दिया गया कि मौलिक अधिकार में संसद संशोधन नहीं कर सकती है। पुनः 1973 में केशवानंद भारती मामले में निर्णय दिया गया कि मौलिक अधिकार में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन संविधान के ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इसके पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी ने 42वां संविधान संशोधन करके 'संविधान के अंदर संविधान' का निर्माण कर दिया। इसे भारत का लघु संविधान भी कहा जाता है। इस संशोधन द्वारा मौलिक अधिकार पर निर्देशक सिद्धांत को वरीयता दी गई। जबकि मूल संविधान में मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता दी गई है। 1980 में मिनरवा मिल्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मौलिक अधिकार तथा निर्देशक सिद्धांत दोनों एक दूसरे के पूरक है के पूरक है दूसरे के पूरक है इनमें किसी को वरीयता नहीं दी जाये।
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bhai kya aap pdf send kar sakte ho is topic ka please bhai