BHARAT GK

5 April 2019

चुनाव संबंधी महत्वपूर्ण तथ्य | Important facts about elections

चुनाव संबंधी महत्वपूर्ण तथ्य :

अक्टूबर 2013 से मतदाताओं को NOTA (None of the above) विकल्प दिया गया। यह अधिकार मध्य प्रदेश राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली एवं मिजोरम के विधानसभा चुनाव में पहली बार दिया गया।
2018 में मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनाव के में NOTA (None of the above) का प्रयोग लगभग 5.42 लाख मतदाताओं ने किया।
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1991 के जनप्रतिनिधि अधिनियम के तहत लोकसभा तथा विधानसभा के चुनाव में जमानत राशि ₹10000 और ₹5000 था। 2009 के अधिनियम के तहत लोकसभा और विधानसभा की जमानत राशि ₹10000 और ₹25000 कर दिया गया। जबकि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए लोकसभा ₹12500 और राज्यसभा और राज्यसभा ₹5000 कर दिया गया।
वैध मतों का 1/6% से कम आने पर जमानत राशि जप्त हो जाती पर जमानत राशि जप्त हो जाती है।
2014 में लोकसभा तथा विधानसभा के चुनाव में उम्मीदवार के खर्च की अधिकतम सीमा लोकसभा का ₹70 लाख और राज्यसभा का ₹28 लाख है।
दिल्ली को छोड़कर सभी केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव में खर्च की राशि MP के लिए ₹55 लाख और MLA के लिए ₹20 लाख निर्धारित किया गया है।
1967 के चुनाव में पहली बार क्षेत्रीय विसंगति आई यानि केंद्र और राज्य में अलग-अलग पार्टी की सरकार बनी और 1967 से ही चुनाव में स्याही का प्रयोग होने लगा। इसी चुनाव से ही राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा किया जाने लगा तथा केंद्र और राज्य के बीच विवाद प्रारंभ हुआ।
चुनाव सुधार से संबंधित समितियां –
  • तारकुंडे समिति - 1975
  • दिनेश गोस्वामी समिति - 1990
  • इंद्रजीत गुप्ता समिति - 1998
चुनाव प्रणाली में मूल्य बहुत सुधार टीएन सेशन ने किया। ये 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे।
यदि कोई व्यक्ति न्यायालय द्वारा 2 वर्ष की सजा दिया गया हो तो वह व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता है।
निर्वाचन संबंधित याचिका पर 6 महीना के अंदर सुनवाई आवश्यक है।
लोकसभा सदस्य बनने के लिए अनुच्छेद 84 में प्रावधान है।
10 जुलाई 2013 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया की जेल में बंद कोई व्यक्ति यदि मतदान के लिए अयोग्य हो तो वह चुनाव नहीं लड़ सकता है।
धारा 33-7A के तहत कोई भी उम्मीदवार दो से अधिक स्थानों से चुनाव नहीं लड़ सकता है। जबकि 1997 से पहले ऐसा प्रावधान नहीं था।
2001 की जनगणना के तहत 2026 तक निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा।
मतदाता अनुच्छेद 326 के तहत जिनका उम्र 18 वर्ष हो गया हो वह मतदान कर सकता है (61वां संविधान संशोधन)।
भारत में वर्तमान समय में भारत में मतदाताओं की संख्या 90 करोड़ है।
पहली लोकसभा चुनाव में 489 स्थान में से कांग्रेस को 364 स्थान प्राप्त हुआ था।
छठी लोकसभा चुनाव (1977) में जनता पार्टी ने 542 स्थान में से 296 स्थान लाया।
आठवीं लोकसभा चुनाव 1984 में 508 स्थान में से कांग्रेस ने 401 स्थान लाया। यह सर्वाधिक है।
16वीं लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 543 स्थानों में से 282 स्थान लाया।
सेना को 2003 से प्रॉक्सी मतदान का अधिकार निर्वाचन आयोग ने दिया। प्रवासी भारतीयों को भी 2015 से मतदान का अधिकार मिला है।
टीएन सेशन को चुनाव सुधार का जनक माना जाता है। इन्होंने फोटो पहचान पत्र को लागू किया। हरियाणा पहला राज्य है जहां मतदाताओं को मतदाताओं को फोटो पहचान पत्र दिया गया।
चुनाव के 45 दिनों के अंदर प्रतिनिधि को चुनाव खर्च का हिसाब देना आवश्यक है।
विधानसभा चुनाव में सर्वप्रथम 1982 में केरल पारावुर में
जून 1999 में गोवा पहला राज्य बना जिसने आम चुनाव में EVM (Electronic voting machine) का प्रयोग किया गया।
EVM का प्रयोग हुआ। 14वां लोकसभा चुनाव (2004) सभी राज्यों में EVM का प्रयोग हुआ।
4 फरवरी 2017 को गोवा विधानसभा का चुनाव हुआ था इस चुनाव में अंधे व्यक्तियों के लिए ब्रेल ईवीएम का प्रयोग हुआ।
वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) या वेरिफाइड पेपर रिकार्ड (VPR) एक मतदाता मत प्रणाली का उपयोग करते हुए मतदाताओं को फीडबैक देने का एक तरीका है। सर्वप्रथम 2013 में वीवीपैट का प्रयोग नागालैंड के नोकसेन विधानसभा क्षेत्र में किया गया।
2006 के 16वीं लोकसभा चुनाव में 8 निर्वाचन क्षेत्रों में वीवीपैट का प्रयोग किया गया। 2017 में गोवा विधानसभा चुनाव में भी का प्रयोग किया गया।
25 जनवरी 1950 को चुनाव आयोग की स्थापना हुआ था इसीलिए इस दिन को राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन निर्वाचन आयोग का स्थापना हुआ था।
सबसे अधिक मतों से जीतने वाले उम्मीदवार पश्चिम बंगाल के अनिल बसु है। इन्होंने 2014 में पश्चिम बंगाल के आराम बाग से 592502 मतों से जीता।
वर्तमान चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा है जबकि दो अन्य चुनाव आयुक्त अशोक लवासा और सुनील चंद्र है।
सरकारी कंपनी को छोड़कर कोई भी कंपनी या व्यक्ति यदि किसी पार्टी को ₹20,000 से अधिक चंदा देती है तो उसे निर्वाचन आयोग को सूचित करना होगा 2013 से यह व्यवस्था लागू है।

1 February 2019

भारत के उपराष्ट्रपति | Vice President

भारत के उपराष्ट्रपति

संविधान के भाग 5 और अनुच्छेद 63 से अनुच्छेद 73 तक उपराष्ट्रपति का वर्णन है। उपराष्ट्रपति पद अमेरिका से लिया गया है। भारत में राष्ट्रपति के बाद उपराष्ट्रपति का पद कार्यकारिणी में दूसरा सबसे बड़ा पद होता है। भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन थे। वर्तमान (2019) में वेंकैया नायडू है।
अनुच्छेद 63 के अनुसार भारत में उपराष्ट्रपति होंगे।
अनुच्छेद 64 के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति होगें।
अनुच्छेद 65 के तहत राष्ट्रपति की मृत्यु त्यागपत्र या हटाने की स्थिति में उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेंगे। कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के दौरान सभापति के रूप में कार्य न कर उपसभापति के रूप में कार्य करेंगे।
सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति का वेतन पहले ₹135000 था जो वर्तमान में ₹300000 है। पहला कार्यवाहक राष्ट्रपति राधाकृष्णन तथा दूसरा वी वी गिरी थे। कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में अधिकतम 6 महीना ही कार्य कर सकेंगे जबकि अमेरिका में शेष समय के लिए उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं।

उप राष्ट्रपतियों की सूची :

उपराष्ट्रपति पद ग्रहण एवं पद मुक्ति
डॉ एस राधाकृष्णन 1952 से 1962
डॉ जाकिर हुसैन 1962 से 1967
वी वी गिरि 1967 से 1969
गोपाल स्वरूप पाठक 1969 से 1974
बी डी जत्ती 1974 से 1979
मोहम्मद हिदायतुल्लाह 1979 से 1984
आर वेंकटरमन 1984 से 1987
डॉ शंकर दयाल शर्मा 1987 से 1992
के आर नारायणन 1993 से 1997
कृष्णकांत 1997 से 2002
भैरों सिंह शेखावत 2002 से 2007
हामिद अंसारी 11-08-2007 से 11-08-2012
वेंकैया नायडू 11-08-2017 से वर्तमान (2019)

उपराष्ट्रपति का निर्वाचन

अनुच्छेद 66 में उपराष्ट्रपति के निर्वाचन का वर्णन है। निर्वाचन अनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत से होता है। निर्वाचन में दोनों सदनों के निर्वाचित एवं मनोनीत सदस्य भाग लेते हैं।

उपराष्ट्रपति की योग्यता

उपराष्ट्रपति बनने के लिए निम्न शर्त आवश्यक है :
  • भारत का नागरिक हो।
  • 35 वर्ष आयु पूरी कर चुका हो।
  • राज्यसभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो।
  • लाभ के पद पर ना हो यदि को तो त्यागपत्र देना आवश्यक है।
  • उपराष्ट्रपति संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा और यदि संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का कोई सदस्य उपराष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है तो यह समझा जाएगा कि उसने उस सदन में अपना स्थान उपराष्ट्रपति के रूप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है।

उपराष्ट्रपति का कार्यकाल

अनुच्छेद 67 में उपराष्ट्रपति के कार्य काल का वर्णन है। उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का का होता है। 5 वर्ष पूरे होने पर भी वह तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक कि नव निर्वाचित उपराष्ट्रपति पद ग्रहण नहीं कर लेता। उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए राज्य सभा बहुमत से संकल्प पारित किया हो और लोकसभा सहमत हो।
अनुच्छेद 68 के तहत उपराष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर पुनः निर्वाचन की व्यवस्था है।
अनुच्छेद 69 में उपराष्ट्रपति के शपथ ग्रहण की व्यवस्था है। उपराष्ट्रपति को शपथ ग्रहण राष्ट्रपति कराते हैं राष्ट्रपति के अनुपस्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश कराएंगे।
अनुच्छेद 70 में यदि राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति दोनों पद रिक्त हो तो उस स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दोनों पदों का निर्वहन करेंगे। 20 जुलाई 1969 को बीवी गिरी के त्यागपत्र देने के पश्चात मोहम्मद हिदायतुल्लाह एक महीना के लिए दोनों पदों का निर्वहन किए थे।
अनुच्छेद 71 के तहत उपराष्ट्रपति निर्वाचन के विवादों का निपटारा सर्वोच्च न्यायालय मे किया जाएगा। यदि निर्वाचन अवैध हो तो उस स्थिति में उनके द्वारा किया गया कार्य वैध होगा।
अनुच्छेद 72 में राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के क्षमादान का वर्णन है अनुच्छेद 73 में उपराष्ट्रपति के कार्यों का वर्णन है। उपराष्ट्रपति के निम्न कार्य  करते हैं :
उपराष्ट्रपति राज्यसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
सदन में अनुशासन बनाए रखते हैं।
विधेयक पर मतदान कर आते हैं और बराबर की स्थिति में निर्णायक मत देते हैं।
कार्य के दृष्टिकोण से इन्हें लोकसभा के अध्यक्ष के रूप में शक्ति प्राप्त है लेकिन दोनों के वेतन समान है।
दोबारा चुने जाने पर पेंशन की व्यवस्था नहीं है। 1997 से  उपराष्ट्रपति की पेंशन की व्यवस्था की गई है। डॉ राधाकृष्णन लगातार दो बार उपराष्ट्रपति रहे। श्री कृष्ण कांत का पद पर रहते हुए देहांत हो गया। आर वेंकटरमन उपराष्ट्रपति बनने से पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे। कृष्णकांत और भैरव सिंह शेखावत उपराष्ट्रपति बनने से पहले मुख्यमंत्री थे।

4 January 2019

भारत के राष्ट्रपति | President of India

भारत के राष्ट्रपति | President of India

भारतीय संविधान के भाग - 4 और अनुच्छेद 52 से अनुच्छेद 62 तक राष्ट्रपति का वर्णन है। राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रधान होता है। भारत का राष्ट्रपति  संविधान का संरक्षण तथा भारतीय जनता का प्रतीक होता है। अनुच्छेद 52 के तहत भारत में एक राष्ट्रपति होंगे। अनुच्छेद 53 में वर्णन है कि संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। जिसका प्रयोग राष्ट्रपति स्वयं या अधीनस्थ अधिकारी के माध्यम से करेंगे।

राष्ट्रपति का निर्वाचन

अनुच्छेद 54 में राष्ट्रपति के निर्वाचन का वर्णन है। निर्वाचन में दोनों सदनों के निर्वाचित प्रतिनिधि और विधानसभा की प्रतिनिधि भाग लेंगे। 70 वां संविधान संशोधन (1952) के तहत दिल्ली और पांडिचेरी में विधान सभा की स्थापना की गई है। इस हेतु ये दोनों केंद्र शासित प्रदेश राष्ट्रपति निर्वाचन में भाग लेते हैं। राष्ट्रपति का निर्वाचन, निर्वाचक मंडल, गुप्त मतदान, अनुपातिक प्रतिनिधि और एकल संक्रमणीय मत के द्वारा होता है। राष्ट्रपति का कोई भी उम्मीदवार यदि 50% से अधिक मत प्राप्त करते हैं तो वे निर्वाचित घोषित किए जाते हैं। परंतु 50% से कम मत प्राप्त करने पर दोहरी मतगणना का उपयोग करना पड़ता है। दोहरी मतगणना से निर्वाचित होने वाला एकमात्र राष्ट्रपति वीवी गिरी (1969) है।अनुच्छेद 55 में राष्ट्रपति के निर्वाचन में समरूपता एवं समतुल्यता का वर्णन है।
★ संसद सदस्य या विधान सभा का सदस्य अपने राज्य से भी मतदान कर सकते हैं परंतु उन्हें 10 दिन पहले सूचना देना होता है।
★ 1974 में जब गुजरात विधानसभा भंग था इसके बावजूद राष्ट्रपति चुनाव हुआ था।
★ भारत का राष्ट्रपति बनने के लिए जन्म सिद्धांत आवश्यक नहीं है। जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के लिए जन्म सिद्धांत आवश्यक है।
★ राष्ट्रपति निर्वाचन के खिलाफ उम्मीदवार सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं।

राष्ट्रपति का कार्यकाल

अनुच्छेद 56 में राष्ट्रपति के कार्यकाल का वर्णन है। राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्षों तक पद पर रहेंगे तक पद पर रहेंगे। इससे पहले भी उपराष्ट्रपति को सूचना देकर त्यागपत्र दे सकते हैं। इसकी जानकारी लोकसभा के अध्यक्ष को देना होगा। राष्ट्रपति के पद रिक्त होने पर 6 महीना के अंदर अंदर चुनाव आवश्यक है। लेकिन उपराष्ट्रपति के लिए यह व्यवस्था नहीं है। अमेरिका में राष्ट्रपति के अनुपस्थिति में शेष समय  के लिए उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं। जबकि भारत में राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति, कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल 4 वर्षों का होता है और शपथ ग्रहण की तारीख 20 जनवरी है। यदि राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति दोनों का पद रिक्त हो तो ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद को संभालेंगे। 1969 में जब जाकिर हुसैन का देहांत हो गया तो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एम हिदायतुल्ला कार्यवाहक राष्ट्रपति बने।
अनुच्छेद 57 - इस अनुच्छेद में वर्णन है कि राष्ट्रपति दोबारा चुने जा सकते हैं। डॉ राजेंद्र राजेंद्र प्रसाद के अलावा दोबारा चुने जाने वाले राष्ट्रपति अभी तक नहीं बने हैं।

राष्ट्रपति का योग्यता

अनुच्छेद 58 में  राष्ट्रपति बनने की योग्यताओं का वर्णन है।
  • भारत का नागरिक हो।
  • 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  • संसद सदस्य बनने की योग्यता रखता हो।
  • भारत या राज्य सरकार के अधीन लाभ के पद पर ना हो।
  • पागल यदि वालिया ना हो।
★ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति अथवा संघीय राज्य के मंत्री परिषद के सदस्य को लाभ का पद के अंतर्गत नहीं माना गया है। अतः ये सभी राष्ट्रपति के चुनाव में उम्मीदवार हो सकते हैं।
★ पद पर रहते हुए राष्ट्रपति, चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन विवि गिरी ने चुनाव लड़ने के लिए त्याग पत्र दे दिया। इस हेतु सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्ला कार्यवाहक राष्ट्रपति बने थे।
★ प्रोफेसर पद पर रहते हुए भी चुनाव लड़ सकते हैं परंतु गैर राजनीतिक पदाधिकारी पद पर रहते हुए चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

राष्ट्रपति का वेतन

अनुच्छेद 59 में राष्ट्रपति का वेतन भत्ता का उल्लेख है। पहले राष्ट्रपति का वेतन ₹1.5 लाख प्रति महीना मिलता था जिसे वर्तमान समय में बढ़ाकर 5 लाख कर दिया गया है। दोबारा चुने जाने पर पेंशन की व्यवस्था नहीं है। डॉ राजेंद्र प्रसाद दोबारा चुने गए थे। राष्ट्रपति का वेतन आयकर से मुक्त है।
अनुच्छेद 60 - इसमें राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण का वर्णन है। शपथ ग्रहण सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश कराते हैं।

राष्ट्रपति के महाभियोग की प्रक्रिया

अनुच्छेद 61 के तहत राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने की व्यवस्था है। महाभियोग कोई भी सदन लगा सकती है। महाभियोग लगाने के लिए किसी भी  सदन के 1/4 सदस्यों का हस्ताक्षर आवश्यक है। जो सदन महाभियोग लगाती है उसे संकल्प पारित करने से पहले 14 दिन पूर्व राष्ट्रपति को सूचना देना आवश्यक है। इसके बाद कुल सदस्य, उपस्थित सदस्य या मतदान में भाग लेने वाले दो तिहाई बहुमत से पारित करना होगा। इसके बाद दूसरा सदन भेजा जाएगा। दूसरा सदन समीक्षा का सदन होगा। राष्ट्रपति स्वंग या उनके द्वारा नियुक्त अधिकारी अस्पष्टीकरण देंगे। यदि दूसरा सदन भी दो तिहाई बहुमत से पारित कर देती है तो राष्ट्रपति पद से मुक्त समझे जाएंगे। अभी तक (2018) किसी राष्ट्रपति पर महाभियोग नहीं लगाया गया है। परतंत्र भारत में 1788 में वारेन हेस्टिंग्स पर महाभियोग लगाया गया था। परंतु पारित नहीं हो सका। तत्पश्चात 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी रामास्वामी पर महाभियोग लगाया गया पर यह भी पारित नहीं हो सका। इसके पश्चात 2012 में पश्चिम बंगाल के न्यायाधीश सौमित्र सेन और कर्नाटक के न्यायाधीश पी दिनाकरण दिनाकरण पर महाभियोग लगाया गया परंतु उन्होंने त्याग पत्र दे दिया।
अनुच्छेद 62 - इसके तहत राष्ट्रपति के पद रिक्त होने पर 6 महीना के अंदर चुनाव कराना आवश्यक है। राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति, कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं। 1960 में डॉ राजेंद्र प्रसाद रूस की यात्रा पर गए थे तो कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में डॉ राधाकृष्णन ने पदभार संभाला था। पुनः 1961 में जब राष्ट्रपति बीमार पड़ गए गए तो 15 दिनों के लिए राधाकृष्णन कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। 1969 में डॉक्टर जाकिर हुसैन का देहांत हुआ तो वी वी गिरी 6 महीना तक पूर्ण कार्यवाहक राष्ट्रपति बने रहें। अभी तक चार लोगों ने कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया है –
  1. राधाकृष्णन
  2. वी वी गिरी
  3. बी डी जत्ती
  4. मोहम्मद हिदायतुल्ला
कार्यवाहक राष्ट्रपति को राष्ट्रपति की सभी सुविधा दी जाती है। वर्तमान में 14वें (15वां चुनाव) राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद है।
अभी तक 8 लोग निर्विरोध राष्ट्रपति बने है –
  1. डॉ राजेंद्र प्रसाद
  2. फखरुद्दीन अली अहमद
  3. नीलम संजीवा रेड्डी
  4. ज्ञानी जैल सिंह
  5. एपीजे अब्दुल कलाम
  6. श्रीमती प्रतिभा पाटिल
  7. प्रणब मुखर्जी
  8. रामनाथ कोविंद
★ अनुच्छेद 74 के तहत रास्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्री परिषद होगा जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होगा।
★ 42वां संविधान संशोधन के तहत अनुच्छेद 74 में (1) कर यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की बात मानने के लिए बाध्य हैं।
★ अनुच्छेद 75 (1) के तहत राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करते हैं। अन्य मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री के सिफारिश पर राष्ट्रपति करते हैं। प्रधानमंत्री के अलावा कार्यपालिका संबंधित सारी नियुक्तियां राष्ट्रपति करते हैं।
★ अनुच्छेद 11 के तहत राष्ट्रपति द्वारा धन विधेयक को छोड़कर साधारण विधेयक को एक बार पुनर्विचार हेतु भेजा जा सकता है।
★ अनुच्छेद 78 में यह प्रावधान है कि प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल की सारी जानकारी राष्ट्रपति को को देंगे।
★ अनुच्छेद 79 में कहा गया है कि भारत में एक संसद होगा जिनके अंग राष्ट्रपति होंगे।

राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां

अनुच्छेद 80 (3) के तहत राष्ट्रपति राज्यसभा में साहित्य विज्ञान और कला के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त 12 सदस्यों को मनोनीत करते हैं।
अनुच्छेद 331 के तहत लोकसभा में राष्ट्रपति दो एंग्लो इंडियन को मनोनीत करते हैं। जबकि राज्यपाल अनुच्छेद 333 के तहत एक एंग्लो इंडियन को मनोनीत करते हैं। यह प्रावधान 23 वां संविधान संशोधन द्वारा किया गया।
अनुच्छेद 85 के तहत राष्ट्रपति महोदय संसद का अधिवेशन बुलाते हैं, सत्रावसान करते हैं और लोकसभा को भंग भी करते हैं।
अनुच्छेद 86 के तहत राष्ट्रपति दोनों सदनों में अभिभाषण देते हैं और अनुच्छेद 87 के तहत राष्ट्रपति विशेष अभिभाषण देते अभिभाषण देते हैं।
अनुच्छेद 108 के तहत राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाते हैं जिन की अध्यक्षता लोकसभा का अध्यक्ष करते हैं अभी तक 3 बार संयुक्त अधिवेशन हुआ है –
  1. 1961 – दहेज प्रथा
  2. 1978 – बैंकिंग
  3. 2002 – POTA
राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना कोई भी विधेयक कानून का रूप नहीं ले सकती है। यदि राष्ट्रपति को कोई विधेयक अस्वीकार हो तो वह 6 महीना तक अपने पास लंबित रख सकता है। वह किसी विधेयक को पुनर्विचार हेतु वापस संसद में भेज सकता है। 1986 में ज्ञानी जैल सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच गतिरोध के कारण भारतीय डाक संशोधन विधेयक पर वीटो का प्रयोग किया गया। यह विधेयक 'जेबी विटो शक्ति' के नाम से जाना जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति वीटो का प्रयोग केवल 10 दिनों के लिए करते हैं।
संसद में कुछ विधायकों को प्रस्तुत करने से पहले राष्ट्रपति की सहमति लेना आवश्यक है। जैसे –
  • धन विधेयक - अनुच्छेद 110
  • राज्य हित को प्रभावित करने वाले कराधान संबंधी विधेयक - अनुच्छेद 304
  • राज्यों की सीमाओं एवं नामों में परिवर्तन करने वाले विधेयक
  • राज्यों के बीच व्यापार वाणिज्य व समागम पर निबर्धन लगाने वाले विधेयक
अनुच्छेद 129 के तहत राष्ट्रपति अधिवेशन ना चलने पर अध्यादेश जारी करते हैं। सत्र प्रारंभ की 6 सप्ताह के अंदर दोनों सदनों की स्वीकृति आवश्यक है अन्यथा निरस्त समझा जाएगा। 44 वें संविधान संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया गया कि अध्यादेश विधि संवत ना हो तो न्यायालय में चुनौती दिया जा सकता है।
पद पर रहते हुए राष्ट्रपति पर फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। दीवानी मुकदमा चलाया जा सकता है परंतु 2 महीने पूर्व इसकी सूचना देना आवश्यक है।
राष्ट्रपति की सैन्य शक्ति - देश का सर्वोच्च नागरिक होने के नाते राष्ट्रपति तीनों सेनाओं (जल, थल और वायु) का प्रमुख होते हैं।
राष्ट्रपति की राजनीतिक शक्ति - विदेशों में भारतीय राजपूतों की नियुक्ति करना  भारत में विदेशी राजपूतों की नियुक्ति के को स्वीकृति देना तथा सरकार के सभी कार्यपालिका संबंधी कार्य राष्ट्रपति के नाम से होता है।
राष्ट्रपति के न्यायिक अधिकार - राष्ट्रपति न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं उनको पदच्युत करते हैं। अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श ले सकते हैं परंतु परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीं है।
क्षमादान की शक्ति - अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को क्षमादान, प्रतिलंबन, विराम निलंबन लघु करण की शक्ति प्राप्त है।
राष्ट्रपति की आपात शक्तियां - विशेष परिस्थिति में राष्ट्रपति अनुच्छेद 352, अनुच्छेद 356 और अनुच्छेद 360 का प्रयोग करते हैं।
  • अनुच्छेद 352 - राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आपात 
  • अनुच्छेद 356 - राष्ट्रपति शासन 
  • अनुच्छेद 360 - आर्थिक या वित्तीय आपात
 ★ 1969 के चुनाव में नीलम संजीवा रेड्डी हार गए थे फिर 1977 में यह निर्विरोध निर्वाचित हुऐ।
★ डॉ जाकिर हुसैन राष्ट्रपति बनने से पहले बिहार के राज्यपाल थे।
★ जाकिर हुसैन तथा फखरुद्दीन अली अहमद का पद पर रहते हुए देहांत हो गया।
★ डॉक्टर दयाल शर्मा राष्ट्रपति से पहले मुख्यमंत्री और राज्यपाल थे।
★ आंध्र प्रदेश आर वेंकटरमन राष्ट्रपति बनने से पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे।
★ के आर नारायण पहला अनुसूचित जाति के राष्ट्रपति थे। ये विधान सभा को संबोधित करने वाला पहला राष्ट्रपति थे। इन्होंने पंक्तिबद्ध होकर मतदान मतदान किया था। यह हिंदी नहीं जानते थे। इन्होंने 1988 में यूपी के राष्ट्रपति शासन को वापस लिया था और 1999 में बिहार विधानसभा को भंग न करके स्थगित किया और राज्यसभा में बहुमत साबित करने को कहा।
★ मिसाइल मैन के नाम से डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम जाने जाते हैं। कलाम ने भी बिहार विधान सभा को संबोधित किया था तथा इन्होंने बिहार का 3 बार यात्रा किया।
★ दूसरे जनजाति राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद है।
★ नीलम संजीवा रेड्डी और ज्ञानी जेल सिंह NAM के महासचिव पद पर रहे हैं।

30 December 2018

निर्देशक सिद्धांत | Directive Principles of State Policy

निर्देशक सिद्धांत | Directive Principles

भारतीय संविधान में निर्देशक सिद्धांत आयरलैंड के संविधान से लिया गया है। हमारे संविधान के भाग - 4 और अनुच्छेद 36 से अनुच्छेद 51 तक निर्देशक सिद्धांतों का वर्णन है। नीति निर्देशक तत्वों को वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है फिर भी यह देश के शासन के आधार है। यह गांधीवाद, समाजवाद, बौद्धिक उदारवाद तथा अंतरराष्ट्रीयवाद के सिद्धांतों से अभीप्रेरित है। अनुच्छेद 36 में निर्देशक सिद्धांत की परिभाषा दी गई है। अनुच्छेद 37 के तहत भाग - 4 के उपबंधों को न्यायालय प्रतिबंधित नहीं कर सकती है।

नीति निर्देशक सिद्धांत :

अनुच्छेद 38 - सरकार कल्याणकारी राज्य की स्थापना करेगी आय की असमानता को दूर करेगी और सभी को सामाजिक लाभ देगी।
अनुच्छेद 39 - इसमें छह प्रकार का निर्देशक सिद्धांतों का वर्णन है –
  1. स्त्री पुरुष को सामान जीविका का साधन उपलब्ध कराना।
  2. भौतिक साधनों का इस तरह बंटवारा किया जाए ताकि समाज के हर वर्ग को लाभ मिले।
  3. धन के केंद्रीय करण को रोका जाए।
  4. समान कार्य के लिए स्त्री और पुरुष को समान वेतन मिले।
  5. स्त्री - पुरुष एवं बच्चों से ऐसा कार्य न कराया जाए जो उनकी आयु एवं शक्ति के प्रतिकूल हो।
  6. बालकों के स्वास्थ्य का विकास किया जाए।
अनुच्छेद 40 - राज्य सरकार ग्राम पंचायत का गठन करेगी।
अनुच्छेद 41 - राज्य आर्थिक सामर्थ्य के तहत काम, पाने वाले को काम शिक्षा, बेगार को रोजगार तथा बुढ़ापा तथा असहाय को सहायता उपलब्ध कराएगी।
अनुच्छेद 42 - राज्य काम की न्याय संगत दशा सुनिश्चित करेगी, मानवोचित दशाओं तथा प्रस्तुति सहायता सुनिश्चित कराएगी।
अनुच्छेद 43 - राज्य कामगारों के लिए न्याय संगत मजदूरी की व्यवस्था करायेगा साथ ही कृषि उद्योग को आत्मनिर्भर करेगा।
अनुच्छेद 44 - भारत के सभी नागरिकों के लिए राज्य एक समान सिविल संहिता लागू करेगा।
अनुच्छेद 45 - 6 से 14 वर्ष 14 वर्ष के बच्चों को निशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराएगी। 86 वां संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 45 में एक नया अनुच्छेद 21 (क) जोड़ा गया इसके तहत निशुल्क अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 46 - अनुसूचित जाति और जनजाति के हितों की रक्षा करेगी।
अनुच्छेद 47 - राज्य नागरिकों के जीवन स्तर बढ़ाने हेतु स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराएगी और मादक पदार्थों का प्रतिषेध करेगी।
अनुच्छेद 48 - कृषि एवं पशुपालन को आधुनिक बनाएगी। इसके अलावा गाय, बछड़ों तथा अन्य दुधारू पशुओं के नस्ल में सुधार करेगी और दुधारू गाय के वध को रोकेगी। 42वां संविधान संशोधन द्वारा 48 (क) जोड़ा गया। इसके तहत राज्य पर्यावरण संरक्षण प्रदान करेगी और वन्यजीवों की भी रक्षा करेगी।
भारत विश्व का पहला देश है जिसने पर्यावरण संरक्षण को अपने संविधान में शामिल किया है।
अनुच्छेद 49 - राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की रक्षा करेगी।
अनुच्छेद 50 - कार्यपालिका को न्यायपालिका से अलग किया गया है।
अनुच्छेद 51 - राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहेगा। विवादों का निपटारा मध्यस्थता से करेगा।

निर्देशक सिद्धांत और मौलिक अधिकार में अंतर:

  • निर्देशक तत्व आर्थिक कल्याण पर आधारित है, जबकि मौलिक अधिकार राजनीतिक सिद्धांतों राजनीतिक सिद्धांतों पर आधारित है।
  • मौलिक अधिकार सकारात्मक और निरोधात्मक दोनों है, जबकि निर्देशक सिद्धांत सिर्फ सकारात्मक है।
  • मौलिक अधिकार के वाद योग्य है जबकि निर्देशक सिद्धांत वाद योग्य नहीं है।
  • मौलिक अधिकार लोगों के अधिकार के लिए बनाए गए हैं जबकि निर्देशक सिद्धांत समाज की भलाई के उद्देश्य हेतु बनाए गए हैं।
  • मौलिक अधिकार नागरिकों को सोता प्राप्त हो जाती है जबकि निर्देशक सिद्धांत राज्य सरकार द्वारा लागू किए जाने के बाद ही नागरिकों को प्राप्त होते हैं।
  • 42वां संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकार पर निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता दी गई है जबकि मूल संविधान में मौलिक अधिकार को वरीयता दी गई थी।

मौलिक अधिकार तथा निर्देशक सिद्धांत

मौलिक अधिकार तथा नीति निर्देशक सिद्धांत के बीच संविधान निर्माण से ही विवाद चल रहा है। पहला संविधान संशोधन 1951 द्वारा शंकरी प्रसाद मामले में निर्णय लिया गया कि संसद मौलिक अधिकार में संशोधन कर सकती है। पुनः 1967 में गोरखनाथ मामले में निर्णय दिया गया कि मौलिक अधिकार में संसद संशोधन नहीं कर सकती है। पुनः 1973 में केशवानंद भारती मामले में निर्णय दिया गया कि मौलिक अधिकार में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन संविधान के ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इसके पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी ने 42वां संविधान संशोधन करके 'संविधान के अंदर संविधान' का निर्माण कर दिया। इसे भारत का लघु संविधान भी कहा जाता है। इस संशोधन द्वारा मौलिक अधिकार पर निर्देशक सिद्धांत को वरीयता दी गई। जबकि मूल संविधान में मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता दी गई है। 1980 में मिनरवा मिल्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मौलिक अधिकार तथा निर्देशक सिद्धांत, दोनों एक दूसरे के पूरक है। इनमें किसी को वरीयता नहीं दी जाये।
86 वां संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 51 (ट) जोड़कर 11वां मौलिक कर्तव्य को जोड़ा गया। इसके तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों के माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करने का वर्णन था, जिसका वर्तमान में महत्त्व समाप्त हो चुका है। क्योंकि अनुच्छेद 21 (क) अनिवार्य हो गया है। निर्देशक सिद्धांत को केटी शाह ने " भविष्य की तिथि का चेक " कहा था।

27 December 2018

मौलिक कर्तव्य या मूल कर्तव्य | Fundamental Duties

मौलिक कर्तव्य | Fundamental Duties

1976 में गठित स्वर्ण सिंह समिति के सिफारिश पर 42 वां संविधान संशोधन करके भारतीय संविधान में 10 मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया। जिनको भाग - 4 (क) और अनुच्छेद 51 (क) में रखा गया है। मौलिक कर्तव्य रूस के संविधान से लिया गया है। पहले मौलिक कर्तव्यों की संख्या 10 थी जिसे 86 वां संविधान संशोधन 2002 के तहत अनुच्छेद - 51 में (ठ) ग्यारहवां मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया। अनुच्छेद 51 (ठ) में वर्णन है कि 6 से 14 वर्ष के बच्चों को माता-पिता शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराएंगे। यह अधिकार जनता के लिए नैतिक दायित्व है, उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान नहीं है। स्वर्ण सिंह समिति ने दंड का प्रावधान किया था, पर सरकार ने लागू नहीं किया।
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भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्य :

  1. (क) - भारत का प्रत्येक नागरिक भारतीय संविधान का पालन करें। उसके आदर्श संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज, राष्ट्रगान का आदर करें।
  2. (ख) - प्रत्येक नागरिक स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शो को अपने हृदय में संजोए रखे और उसका पालन करें।
  3. (ग) - प्रत्येक नागरिक देश की प्रभुता एकता व अखंडता की रक्षा करें और उसे बनाए रखने में सहयोग प्रदान करें।
  4. (घ) - प्रत्येक नागरिक देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की जी जान से सेवा करें।
  5. (ङ्ग) - भारत के समस्त लोगों में समरसता और और समान भ्रातृत्व की भावना का विकास करे।
  6. (च) - देश की समन्वित सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे व उनका आदर और संरक्षण करें।
  7. (छ) - देश की प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा व उनका संवर्धन करें।
  8. (ज) - वैज्ञानिक दृष्टिकोन वह मानववाद का विकास करें और निरंतर ज्ञानार्जन कर देश की सेवा में अपना ज्ञान को लगाएं।
  9. (झ) - सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखने का प्रयास करें और हिंसात्मक गतिविधि से दूर रहे।
  10. (ञ) - प्रत्येक नागरिक व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के समस्त क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे।
  11. (ट) - माता - पिता, अभिभावक या संरक्षक अपने 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करे। (2002 ईस्वी में 86 वां संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया)

26 December 2018

मौलिक अधिकार या मूल अधिकार | Fundamental Rights

मौलिक अधिकार | Fundamental Rights

भारतीय संविधान के भाग - 3 और अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक मौलिक अधिकार का वर्णन है। इसलिए भाग 3 को 'मूल अधिकारों का जन्मदाता' एवं 'भारत का अधिकार पत्र' कहा जाता है। मौलिक अधिकार का विकास ब्रिटेन में हुआ। वहां के सम्राट किंग जॉन ने 1215 में जनता को एक अधिकार पत्र (Megna Carta) दिया। 1688 में जेम्स II के समय इंग्लैंड में गौरवपूर्ण क्रांति हुई और 1689 में संविधान की सर्वोच्चता स्थापित हुई साथ ही बिल ऑफ राइट्स हस्ताक्षर हुआ।
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1789 की फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात वहां की जनता के लिए मौलिक अधिकार की घोषणा की गई। फ्रांस के पश्चात अमेरिका में 1791 में 10वां संविधान संशोधन करके संविधान में मूल अधिकार को सम्मिलित किया गया। अमेरिका का संविधान 1787 में बना और 1989 में लागू हुआ। वहां के मूल संविधान में मौलिक अधिकार नहीं था। भारतीय संविधान में 'मौलिक अधिकार' संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है।
भारत में सर्वप्रथम मौलिक अधिकारों की मांग बाल गंगाधर तिलक ने 'संविधान विधेयक 1895' के माध्यम से किया। 10 अगस्त 1928 को नेहरू रिपोर्ट की घोषणा की गई थी। उस रिपोर्ट में मौलिक अधिकार से संबंधित 19 अनुच्छेदों को लागू किया गया। मौलिक अधिकार अथवा मूल अधिकार का प्रारूप पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बनाया था।
1931 में कांग्रेस का का विशेष अधिवेशन सरदार पटेल की अध्यक्षता में कराची में हुई। इस अधिवेशन में पहली बार मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य संबंधी विधेयक को सम्मिलित किया गया। कैबिनेट मिशन के सुझाव पर सरदार बल्लभ भाई पटेल ने एक सलाहकार समिति का गठन किया। सलाहकार समिति ने मौलिक अधिकार से संबंधित दो उप समितियां बनाई।
  • मौलिक अधिकार उपसमिति 
  • अल्पसंख्यक उपसमिति
मौलिक अधिकार उप समिति के अध्यक्ष जे बी कृपलानी तथा अल्पसंख्यक उप समिति के अध्यक्ष एच सी मुखर्जी थे। मौलिक अधिकार उप समिति के सिफारिश पर सात मौलिक अधिकार को संविधान में सम्मिलित किया गया। 1978 में जनता पार्टी की सरकार ने 44वां संशोधन कर 'संपत्ति के अधिकार' को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया। जिससे अनुच्छेद 31 का लोप हो गया। इसे अनुच्छेद 300 (A) और भाग 12 के 4 में रखा गया है। अब संपत्ति का अधिकार सिर्फ एक कानूनी अधिकार ही है। वर्तमान समय में छह मौलिक अधिकार है –
  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
  4. धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 से 28)
  5. शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 और 30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
अमेरिका तथा फ्रांस में मौलिक अधिकार को प्राकृतिक या नैसधिक अधिकार के नाम से जाना जाता है। इसका हनन नहीं किया जा सकता है। भारत में मौलिक अधिकार एक संविधान प्रदत्त अधिकार है। अनुच्छेद 358 के तहत अगर बाह्य आपात लागू हो तो मौलिक अधिकार से संबंधित अनुच्छेद 19 का निलंबन होगा। लेकिन यदि आंतरिक आपात लागू हो या सशस्त्र विद्रोह की भावना हो तो मौलिक अधिकार के सभी अनुच्छेदों का हनन होता था परंतु 44 वां संविधान संशोधन (1978) द्वारा यह प्रावधान किया गया की आंतरिक या बाह्य आपात होने पर भी अनुच्छेद 20 और 21 का हनन नहीं होगा।

1. समता या समानता का अधिकार

अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 तक  समता या समानता के अधिकार का वर्णन है।
अनुच्छेद 14  - राज्य का कानून सभी पर एक समान लागू होगा। ऊंच-नीच, गरीब-अमीर या किसी भी आधार पर पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 15 - राज्य जाति नस्ली धर्म लिंग जन्म स्थान आदि के आधार पर अपने नागरिकों के जीवन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा परंतु राज्य स्त्रीयों, बालकों एवं पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपबंध कर सकती है।
अनुच्छेद 16 - अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग को छोड़कर राज्य नियुक्ति हेतु किसी नागरिक से किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा। प्रत्येक आम नागरिक को अवसर की समानता होगी। अनुच्छेद 16 (4) के तहत राज्य अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े वर्गों और पिछड़े वर्गों पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाने हेतु आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 17 - इस अनुच्छेद के द्वारा अस्पृश्यता या छुआछूत का अंत किया गया। छुआछूत या अस्पृश्यता को दंडनीय अपराध की श्रेण में रखा गया है।
42वां संविधान संशोधन द्वारा अस्पृश्यता का नाम बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कर दिया गया। 1989 में राजीव गांधी पुनः इसका नाम अनुसूचित जाति-जनजाति कानून कर दिया।
अनुच्छेद 18 - इस अनुच्छेद के द्वारा सैन्य और शिक्षा को छोड़कर सारे उपाधियों को समाप्त कर दिया गया था। 1977 में जब जनता पार्टी आई तो सैन्य और शिक्षा की उपाधि को भी समाप्त कर दिया गया। पुनः 1980 में कांग्रेस सत्ता में आई और शिक्षा और सैन्य उपाधियों को प्रारंभ कर दिया गया।

2. स्वतंत्रता का अधिकार

अनुच्छेद 19 से अनुच्छेद 22 तक स्वतंत्रता के अधिकार के अधिकार के अधिकार का वर्णन है। पहले कुल 7 प्रकार की स्वतंत्रता का अधिकार था। 44 वां संविधान संशोधन द्वारा 19 (च) को समाप्त कर दिया गया। इसमें धन अर्जन संबंधित प्रावधान था।
अनुच्छेद 19 - अनुच्छेद 19 के तहत मूल संविधान में सात प्रकार की स्वतंत्रता का प्रावधान था, जो अब सिर्फ 6 रह गया है।
अनुच्छेद 19 (क) - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 19 (ख) - शस्त्र रहित शांतिपूर्वक एकत्रित होने व सभा सभा करने की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 19 (ग) - संस्था एवं संघ बनाने की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 19 (घ) - देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन या भ्रमण की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 19 (ङ) - देश के किसी भी भाग में निवास करने की स्वतंत्रता। अपवाद - जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर।
अनुच्छेद 20 (क) - इसमें वर्णन है कि अपराध के लिए तब तक कोई दोषी नहीं होगा, जब तक अपराध सिद्ध ना हो जाए।
अनुच्छेद 20 (ख) - किसी अपराधी को एक अपराध के लिए सिर्फ एक ही दंड की व्यवस्था है।
अनुच्छेद 20 (ग) - इसमें कहा गया है कि किसी भी अपराध के आरोपी को खुद के खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 21 इसके तहत किसी व्यक्ति को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार है। 86 वा संशोधन 2002 के साथ भाग 21 में (क) जोड़ा गया जिसमें प्रावधान है कि 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दिया जाए।
अनुच्छेद 22 - इस अनुच्छेद में व्यक्ति को तीन प्रकार का अधिकार  प्राप्त है।
  • पुलिस को गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को हिरासत में लेने का कारण बताना होगा।
  • हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटा (आने-जाने का समय छोड़कर) के अंदर न्यायालय में उपस्थित किया जाए।
  • हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील इसे कानूनी परामर्श लेने का अधिकार होगा।
यह अधिकार दो तरह के अपराधियों को नहीं दिया जाएगा।
  • शत्रु देश के निवासियों को।
  • निवारक निरोध अधिनियम के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को।
निवारक निरोध कानून - इसके तहत किसी व्यक्ति को अपराध करने से रोकने के लिए अपराध करने से पूर्व शंका के आधार पर गिरफ्तार किया जाता है।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार

अनुच्छेद 23 और अनुच्छेद 24 तक शोषण के विरुद्ध अधिकार का वर्णन है।
अनुच्छेद 23 - किसी व्यक्ति का क्रय-विक्रय नहीं किया जा सकता ना ही बेगार या जबरदस्ती काम करवाया जा सकता है। सिर्फ राष्ट्रीय सेवा हेतु व्यक्ति को बाध्य किया जा सकता है।
अनुच्छेद 24 - 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खानों कारखाना उद्योग व अथवा किसी प्रकार के जोखिम भरे कार्य नहीं करवाए जा सकता है।

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का वर्णन है।
अनुच्छेद 25 - इस अनुच्छेद के तहत भारत के नागरिक को किसी भी किसी भी धर्म को मानने और धर्म का प्रचार - प्रसार करने का अधिकार प्राप्त है। सिखों के द्वारा कृपाल रखना धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार रखना धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत आता है।
अनुच्छेद 26 - इस अनुच्छेद में धार्मिक संस्था की स्थापना और उसके संरक्षण का प्रावधान है।
अनुच्छेद 27 - इस अनुच्छेद के तहत धार्मिक कर नहीं लगाया जा सकता है।
अनुच्छेद 28 - इस अनुच्छेद में वर्णन है कि राजकीय विद्यालय में धार्मिक पढ़ाई नहीं होगी ना ही उन विद्यालय के छात्र-छात्राओं को धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने तथा कोई भी धर्मोपदेश सुनने के लिए निर्देश नहीं दिया जा सकता है।

5. संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार

अनुच्छेद 29 और 30 में संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार का वर्णन है।
अनुच्छेद 29 - इस अनुच्छेद में वर्णन है कि भारत के नागरिक के प्रत्येक वर्ग अपनी भाषा लिपि या संस्कृति संस्कृति को बनाए रख सकते हैं। किसी भी नागरिक को  राज्य द्वारा चलाई जाने वाली अथवा उससे सहायता प्राप्त किसी भी शिक्षण संस्थान में धर्म, मूल, वंश, जाति या भाषा के कारण प्रवेश से इनकार नहीं किया जा सकता है।
अनुच्छेद 30 - इस अनुच्छेद में वर्णन है कि भारत के अल्पसंख्यक वर्ग अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्थान का निर्माण कर सकते हैं और राज्य उस संस्थान को अनुदान देने में विभेद नहीं करेगी।
अनुच्छेद 31 - इस अनुच्छेद में संपत्ति के अधिकार का वर्णन था। जिसे 44 वां संविधान संशोधन द्वारा हटाकर 12 के 4 और अनुच्छेद 300 (क) में रखा गया है।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

अनुच्छेद 32 में संवैधानिक उपचारों के अधिकार का वर्णन है। इसमें वर्णन है कि मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकते हैं। अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में अपील किया जा सकता है। इस अधिकार के बिना मौलिक अधिकार का कोई वजूद नहीं है। इसलिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधानिक उपचारों के अधिकार को 'संविधान की हृदय' की संज्ञा दी है। जबकि प्रस्तावना को 'संविधान की कुंजी' कहा गया है। अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों की सुरक्षा हेतु सर्वोच्च न्यायालय पांच प्रकार की रिट जारी कर सकता है।
  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus)
  2. परमादेश (Mandamus)
  3. प्रतिषेध लेख (Prohibition)
  4. उत्प्रेषण (Certiorari)
  5. अधिकार पृच्छा लेख (Quo-warranto)
अनुच्छेद 33 के तहत संसद विधि बनाकर बलपूर्वक पुलिस बल, ब्यूरो तथा उच्च संगठनों पर नियंत्रण रख संगठनों पर नियंत्रण रख सकती है।
अनुच्छेद 34 के तहत यदि देश में सैन्य शासन लागू हो तो उस स्थिति में 359 के तहत मौलिक अधिकार का हनन होगा।
अनुच्छेद 35 के तहत भाग - 3 के उपबंधों को प्रभावित करने या विधान बनाने तथा निरस्त करने की शक्ति प्राप्त है।

मौलिक अधिकारों में संशोधन

मौलिक अधिकार तथा नीति निर्देशक सिद्धांत के बीच बीच संविधान निर्माण से ही विवाद चल रहा है। पहला संविधान संशोधन 1951 द्वारा शंकरी प्रसाद मामले में निर्णय लिया गया कि संसद मौलिक अधिकार में संशोधन कर सकती है। पुनः 1967 में गोरखनाथ मामले में निर्णय दिया गया कि मौलिक अधिकार में संसद संशोधन नहीं कर सकती है। पुनः 1973 में केशवानंद भारती मामले में निर्णय दिया गया कि मौलिक अधिकार में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन संविधान के ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इसके पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी ने 42वां संविधान संशोधन करके 'संविधान के अंदर संविधान' का निर्माण कर दिया। इसे भारत का लघु संविधान भी कहा जाता है। इस संशोधन द्वारा मौलिक अधिकार पर निर्देशक सिद्धांत को वरीयता दी गई। जबकि मूल संविधान में मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता दी गई है। 1980 में मिनरवा मिल्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मौलिक अधिकार तथा निर्देशक सिद्धांत दोनों एक दूसरे के पूरक है के पूरक है दूसरे के पूरक है इनमें किसी को वरीयता नहीं दी जाये।