संगम काल | Sangam Period - BHARAT GK

13 June 2019

संगम काल | Sangam Period

संगम काल

संगम (संस्कृत) का शब्द है जिसका अर्थ संग, परिसर या सभा होता है। दक्षिण भारत के इस प्रदेश में तमिल कवियों द्वारा सभाओं तथा गोष्ठियों का आयोजन किया जाता था। इन गोष्ठियों में विद्वानों के मध्य विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया जाता था, इसे ही 'संगम' के नाम से जाना जाता है। इस शब्द का प्रयोग तिरुवरूर वकार नयनार ने किया था। पाण्ड्य नेतृत्व में तीन संगम संगम का आयोजन किया गया। इसमें दक्षिण के 3 राज्य (चेर, चोर तथा पाण्ड्य) सम्मिलित थे।
पहला संगम - पहला संगम पाण्ड्य की राजधानी मथुरा में हुआ जिसकी अध्यक्षता अगस्त ऋषि ने किया।

दूसरा संगम - दूसरा संगम का आयोजन मधुरा के समुंद्र में विलय हो जाने के कारण कपाट पुरम में हुआ। इसके अध्यक्ष तोलकपियर थे। इन्होंने व्याकरण ग्रंथ तोल्कापपियम् की रचना किया। यह एक व्याकरण ग्रंथ है।

तीसरा संगम - तीसरा संगम का आयोजन परवर्ती मदूरा नगर में हुआ जिसकी अध्यक्षता नक्कीकर ने किया किया। इस संगम में बहुत सारे ग्रंथों की रचना हुई जिसमें प्रमुख है –

शिलप्पादिकारम् - इसके रचयिता इलांगो अडिगल है। इसे संगम काल का महाकाव्य कहा जाता है। इसे राष्ट्रीय तमिल काव्य भी माना जाता है। शिलप्पादिकारम् का अर्थ पायल की कथा होता है। यह ग्रंथ प्रेम कथा पर आधारित है इसका नायक कोबलन और नायिका कण्णगी है। इस ग्रंथ में कण्णगी पूजा (पत्नी पूजा) का उल्लेख मिलता है।

मणिमेकलई - इसके रचनाकार चितलाई चतनार है। यह भी प्रेम कथा पर आधारित है। इसकी नायिका माधवी है यह प्रेमी की मृत्यु के पश्चात बौद्ध भिक्षु बनी थी।

तिरुक्कुरल - इसकी रचना तिरुवल्लुवर ने किया। इसे संगम काल का बाइबिल कहा जाता है। इसे दक्षिण का पांचवा वेद माना जाता है। इसमें धर्म शास्त्र, अर्थशास्त्र और कामसूत्र का वर्णन है।

जीवक चिंतामणि - इसके रचनाकार तिरुतक्कदेवर है। इसमें जन्म से लेकर मोक्ष तक का वर्णन है। इसमें कवि ने 'जीवक' नामक राजकुमार का जीवनवृत्त प्रस्तुत किया है।

संगम काल के प्रमुख वंश :

चेर वंश

संगम काल में पाड्य, चोल और चेर में सबसे प्राचीन चेर राज्य था। सत्ता का केंद्र केरल था। प्रथम शासक उदयन को माना जाता है। इन्होंने केरल में पाकशाला की स्थापना किया, यहां जनता को भोजन कराया जाता था। इस वंश का महान शासक शेनगुट्टुवन या लाल चेर था। इन्होंने अपनी पत्नी कन्नागी की की पूजा देवी के रूप में मूर्ति बनाकर प्रारंभ करवाया। लाल चेर के पश्चात इसका भाई पेरुनजेरल इरंपोरई शासक बना। इसका युद्ध चोल शासक करिकाल से हुआ। घायल हो जाने के कारण इसे हार का सामना करना पड़ा। प्रायश्चित हेतु रणभूमि रणभूमि में ही शरीर का त्याग कर दिया।

चोल वंश

चोल वंश का सबसे प्रतापी शासक करिकाल था। करिकाल अर्थ जला हुआ पैर वाला व्यक्ति होता है। इसने कावेरी नदी के तट पर पूम्पुहर को राजधानी बनाया। इसने चेर शासक पेरुजेरल को परास्त किया था। करिकाल ने संपूर्ण तमिल क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया। इसकी नाभिक शक्ति सुदृढ़ सुदृढ़ होने के कारण इसने श्रीलंका पर श्रीलंका पर भी अधिकार किया।

पांड्य वंश

पांड्य वंश का सबसे महत्वपूर्ण शासक Nedunjeliyan II नेदुनजेलियण था। सत्ता का केंद्र मदुरै था। इन्होंने शिलप्पादिकारम् के नायक कोबलन को मृत्युदंड दिया क्योंकि इस पर इसके पत्नी के पायल चुराने का आरोप था। पांडे शासकों का रोम के साथ व्यापारिक संबंध था।
चेर का प्रतीक चिन्ह - धनुष
चोल का प्रतीक चिन्ह - बाघ या चीता
पांडे का प्रतीक चिन्ह -  मछली
संगम काल में कर 1/6 था।
इस समय के महत्वपूर्ण देवता मुरुगन थे।
चोल राज्य को चोर मंडलम या कोरोमंडल कहा जाता था।
पांडे की सत्ता का केंद्र मदुरई और महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र प्रतिष्ठान आंध्र प्रदेश थी।
संगम काल में न्यायालय को मनरम कहा जाता था और गुप्तचर को ओरर कहा जाता था।
संगम युग को तमिल साहित्य का स्वर्ण युग काल कहा जाता है। इसका समय 300 ईसा पूर्व से 300 ईसवी तक माना जाता है। संगम साहित्यों के अनुसार इस समय समाज में वर्ण व्यवस्था का स्पष्ट विभाजन नहीं था, फिर भी समाज में ब्राह्मणों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।

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