भारतीय मानसून | Monsoon in India

मानसून |Monsoon

अंग्रेज़ी शब्द 'Monsoon' पुर्तगाली शब्द monção से निकला है, जिसका मूल उद्गम अरबी शब्द 'मॉवसिम' से आया है इसलिये मानसून शब्द की उत्पत्ति का देस अरब को माना जाता है।
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मानसून की उत्पत्ति भूमध्यसागरीय क्षेत्र से होती है। भारत में इसका केंद्र केरल है। मानसून वायुमंडल के 3 से 7 किलोमीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है। मानसून पर पहला सम्मेलन 1958 में हुआ था तत्पश्चात 1973 में हुआ। इस सम्मेलन में तिब्बत के पठार को मानसून का केंद्र माना गया।
भारत में मानसून का आगमन 1 जून से केरल में होता है और 15 जून तक उत्तर भारत में प्रवेश कर जाता है लेकिन 15 जुलाई तक संपूर्ण भारत में विस्तारित हो जाता है। सामान्यता भारत में वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून (southwest monsoon) से होती है। जबकि तमिलनाडु में लौटती मानसून यानि उत्तर-पूर्व मानसून से होती है। यह वर्षा अक्टूबर-नवंबर में होती है। मानसून की उत्पत्ति में 5 से 6 सप्ताह का समय लगता है। भारतीय कृषि को "मानसून का जुआ" माना जाता है, क्योंकि भारतीय कृषि मानसून पर ही निर्भर है।

आद्रता (Humidity) - वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आद्रता कहते हैं। वायुमंडल में प्रति इकाई आयतन में आद्रता 1 से 4% तक रहता है। आद्रता मानसून व जलवायु निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

वायु की सामर्थ आद्रता - एक निश्चित ताप पर एक घन मीटर वायु जितना ग्राम जलवाष्प अवशोषित करती है उसे हम वायु की सामर्थ्य आद्रता कहते हैं।

संतृप्त वायु (Saturated air) - जब वायू में उनकी आद्रता के अनुसार जलवाष्प आ जाए तो उसे हम संतृप्त वायु कहते हैं।

ओसांक बिंदु (Dew point) - जिस न्यूनतम ताप पर वायु वायु संतृप्त हो जाता है, उसे ओसांक बिंदु कहते हैं।

आद्रता तीन प्रकार की होती है :

निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute humidity) - वायु के प्रति इकाई आयतन में विद्वान जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे ग्राम प्रति घन में व्यक्त करते हैं।

विशिष्ट आर्द्रता (Specific humidity) - वायु की प्रति इकाई भाग में जलवाष्प की मात्रा को विशिष्ट आर्द्रता कहते हैं विशिष्ट आद्रता को ग्राम प्रति किलोग्राम में व्यक्त करते हैं।

सापेक्षिक आर्द्रता - किसी ताप पर वायु में उपस्थित जलवाष्प तथा उसी ताप पर वायु की आद्रता सामर्थ के अनुपात को आपेक्षित आद्रता आद्रता कहते हैं। इसे प्रतिशत (%) में व्यक्त करते हैं। आद्रता 100% हो जाने पर संघनन  की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और गुरुत्वाकर्षण के कारण वर्षा होने लगती है।

संघनन - जल की गैसीय अवस्था का तरल या ठोस में परिवर्तन होने की क्रिया को संघनन कहते हैं। संघनन दो कारकों पर निर्भर करती है :
  1. तापमान की कमी
  2. वायु की सापेक्ष आर्द्रता
वायु में उपस्थित धूलकण, धूआँ और समुद्री नमक इत्यादि संघनन के केंद्र माने जाते हैं। संघनन क्रिया के परिणाम स्वरूप ओस, कोहरा, कुहासा और बादल का निर्माण होता है।

ओस (Dew) - जब वायु का ताप ओसांक बिंदु से नीचे गिर जाता है तो वायु में उपस्थित जलवाष्प संघनन होकर छोटे-छोटे बूंदों के रूप में धरातल पर गिरने लगता है, उसे उस ओस करते हैं।

पाला (Frost) - जब वह सॉन्ग हिमांग से नीचे चला जाए नीचे चला जाए और अतिरिक्त जलवाष्प में परिवर्तित हुए बिना ठोस में परिवर्तित हो जाए उसे पाला कहते हैं।

कोहरा एवं कुहासा (Fog and Woe) - वायुमंडल में एकत्रित धूलकण पर संघणित जल पिंड को कोहरा कहते हैं। कुआशा भी एक प्रकार की कोहरा ही है। कुहासा की दृश्यता 1 किलोमीटर से अधिक और 2 किलोमीटर किलोमीटर से कम होती है। जबकि कोहरा की स्थिति में 200 मीटर से अधिक की वस्तु को नहीं देखा जा सकता है।

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