20 December 2017

चोल वंश | Chola Dynasty in Hindi

चोल वंश | Chola Dynasty in Hindi :

चोल पल्लव के सामंत थे। पल्लव वंश के ध्वंसावसेसो पर चोल वंश की नींव रखी गयी थी। चोल वंश के संस्थापक विजयालय ( 850 - 871 ई०) थे इन्होंने 9वी शताब्दी  में चोल वंश की स्थापना किया। इसकी राजधानी तंजौर या तांजाय या तंजावूर थी। तंजावूर का वास्तुकार कुंजरमल्लन राजराज पेरुथच्चन था। विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण किया था। निशुम्भसूदिनी का मंदिर विजयालय ने बनवाया।

आदित्य प्रथम (871-907 ई०)

स्वतंत्र शक्तिशाली शासक आदित्य प्रथम थे इन्होंने पल्लव शासक अपराजित को परास्त कर पल्लव पर आधिपत्य कायम कर लिया। कावेरी नदी के मुहाने पर शिव मंदिर का निर्माण आदित्य प्रथम ने करवाया।

परांतक प्रथम (907-950ई०)

आदित्य प्रथम के बाद परांतक प्रथम शासक बना इन्होंने पांड शासक नरसिंह को परास्त कर मदुरैकोंडा (मदुरै को जीतने वाला) की उपाधि धारण किया। परांतक प्रथम ने पल्लवों पर जीत हासिल किया और इस उपलक्ष में कोदंडराम की उपाधि धारण किया।

राजराज प्रथम (985 - 1014 ई०)

आदित्य प्रथम के बाद परांतक द्वितीय का पुत्र राजराज प्रथम शासक बना। ये शैव धर्म के अनुयायी थे। ये एक महान शाषक थे। इन्होंने चोल की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः वापस किया वापस किया। सम्राज्य विस्तार के क्रम में मैसूर के गंगों, मदुरै के पांड्यो तथा बेंगी के चालुक्यों को परास्त किया। इन्होंने लंका के उत्तरी भाग पर भी आक्रमण किया और वहां के शासक राजा माहिम पंचम को परास्त कर लंका पर आधिपत्य कायम किया। माहिम पंचम को भागकर श्रीलंका के दक्षिण जिला रोहण में शरण लेनी पड़ी थी। राजराज प्रथम ने श्रीलंका में जीते गए क्षेत्र का नाम  मुम्ड़ीचोलमंडलम रखा और इसकी राजधानी अनुराधापुर के स्थान पर पोलन्नरूवा को बनाया साथ ही वहां एक शिव मंदिर का निर्माण कराया जो अभी भी विधमान है। चोल के समय भूमि माप की इकाई वेली थी। राजराज ने तंजोर में 13  मंजिला राजराजेश्वर या वृद्धेश्वर का मंदिर बनवाया। यह राजा राज महान के नाम से विख्यात है।

राजेंद्र प्रथम

राजराज प्रथम के पश्चात् पुत्र राजेंद्र प्रथम शासक बने। यह चोल वंश के सबसे शक्तिशाली शासक हुए। इन्होंने संपूर्ण श्रीलंका पर आधिपत्य कायम कर महेंद्र पंचम को बंदी बना लिया। चोल साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार राजेंद्र प्रथम के काल में हुआ। राजेंद्र प्रथम ने पाल शासक महिपाल को परास्त किया और गंगा घाटी तक आधिपत्य होने के कारण गंगैकोंडचोल की उपाधि धारण किया। राजेन्द्र प्रथम ने तंजौर के समीप चोलगंगम नामक तालाब बनवाया और उस तालाब में गंगा का पानी ला कर डाला और उसके निकट गंगैकोंडचोलपुरम् नामक नगर बसाया। राजेन्द्र प्रथम के पास विशाल नौसेना थी जिनके कारण दक्षिण-पूर्व एशिया की मलाया, सुमात्रा और जावा द्वीप को भी जीता। यह विद्वान शासक थे उन्होंने तंजौर में वैदिक विद्यालय की स्थापना किया और पंडित चोल की उपाधि धारण किया। राजेन्द्र प्रथम गजनी के सुल्तान महमूद का समकालीन था। तिरुवलंगान्डु एव तंजौर अभिलेख से राजेन्द्र प्रथम की विस्तृत जानकारी मिलती है। राजेन्द्र प्रथम ने मुदिकोंड और कुदारकोंड की भी उपाधियां धारण किया था। राजराज प्रथम चोल वंश के प्रथम शासक थे जिन्होंने भूमि का सर्वेक्षण करवाया।

चोल काल मे भूमि के प्रकार :

  • वेल्लनवगाई : गैर ब्राह्मण किसान स्वामी की भूमि।
  • ब्राह्मदेय : ब्राह्मणों को उपहार में दी गई भूमि।
  • शालाभोग : किसी विद्यालय की राख रखाव की भूमि।
  • देवदान या तिरुनमटडक्कनी : मंदिर को उपहार दी गई भूमि।
  • पल्लीच्चंदम : जैन संस्थानों को दान दी गई भूमि।
चोल काल में भूमि कर उपज का 1/3 होता था।

राजाधिराज

राजेन्द्र प्रथम के पश्चात राजाधिराज शासक बने इन्होंने चालुक्य शासक विक्रमादित्य को परास्त कर विजय राजेंद्र की उपाधि धारण किया और कल्याणी से एक द्वारपाल की मूर्ति लाकर अपने दरबार में लगा दिया। चोल वंश के अंतिम शासक अधिराजन या राजेंद्र तृतीय थे इनके समय जनविद्रोह जनविद्रोह हुआ और इनको समाप्त कर दिया गया। उसके बाद चोल तथा चालुक्य का संयुक्त शासन प्रारंभ हुआ। प्रथम शासक पोलो तुंग प्रथम हुए उन्होंने पुनः भूमि का सर्वेक्षण करवाया और अपना दूत चीन भेजा। चोल वंश के अंतिम शासक राजेंद्र तृतीय था। राजेंद्र तृतीय को पांड्य शासकों ने पराजित कर चोल वंश का अंत कर दिया था।

चोल वंश के शासक :

  • विजयालय चोल – 848-871
  • आदित्य प्रथम – 871-907 -
  • परन्तक चोल प्रथम – 907-950
  • गंधरादित्य – 950-957
  • अरिंजय चोल – 956-957
  • सुन्दर चोल – 957-970
  • उत्तम चोल – 970-985
  • राजाराज चोल प्रथम – 985-1014
  • राजेन्द्र चोल प्रथम 1012-1044
  • राजाधिराज चोल प्रथम 1018-1054
  • राजेन्द्र चोल द्वितीय – 1051-1063
  • वीरराजेन्द्र चोल 1063-1070
  • अधिराजेन्द्र चोल 1067-1070

चालुक्य - चोल :

  • कुलोतुंग चोल प्रथम – 1070-1120
  • कुलोतुंग चोल द्वितीय – 1133-1150
  • राजाराज चोल द्वितीय – 1146-1163
  • राजाधिराज चोल द्वितीय – 1163-1178
  • कुलोतुंग चोल तृतीय – 1178-1218
  • राजाराज चोल तृतीय – 1216-1256
  • राजेन्द्र चोल तृतीय – 1246-1279

चोल संस्कृति की विशेषता :

चोल की मुख्य विशेषता स्थानीय स्वशासन थी। वर्तमान पंचायती राज्य व्यवस्था चोल की ही देन है। चोल का स्थानीय स्वशासन बहुत ही मजबूत थी। प्रांत को मंडलम कहा जाता था, कमिश्नरी को कोट्टम, जिला को नाडु, ग्राम को कुर्रम कहा जाता था। नगर की स्थानीय सभा को नगरतार, जिलों की स्थानीय सभा को नाटुर और आम जनता की समिति को उर कहा जाता था। सभा या महासभा अग्रहरो और ब्राह्मणों की सभा होती थी इसके सदस्यों को पेरूमक्कल कहा जाता था। व्यापारियों की सभा को नगरम कहा जाता था। चोल काल में सोने के सिक्कों को काशु कहते थे। चोल काल में धान आम वस्तुओं के आदान-प्रदान का माध्यम होता था। तमिल साहित्य के त्रिरत्न कहलाते थे – पुगलेंदि, कम्बन और औट्टक्कुट्टन। कन्नड़ साहित्य के त्रिरत्न कहलाते थे – पोन्न, रन्न और पम्प।
चोल कालीन सभी मंदिरों में सबसे महत्वपूर्ण नटराज शिव मंदिर है। मंदिर के प्रवेश द्वार को गोपुरम कहा जाता था। चोल की भाषा संस्कृत और तमिल थी।