पल्लव वंश | Pallava dynasty

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पल्लव वंश | Pallava dynasty (275-897 ई०)

पल्लव राजवंश दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंशो में एक है। पल्लव वंश का संस्थापक सिंहविष्णु थे इन्होंने 575 से 600 ई० तक शासन किया। इनकी राजधानी कांंची (तमिलनाडु का कांचीपुरम) थी। ये वैष्णव धर्म को मानते थे। सिंहविष्णु को सिंहविष्णुपोत्तरयण और अवनिसिंह भी कहा जाता है।
सिंहविष्णु ने मद्रास स्थित मामलपुर में बड़ा मंदिर का निर्माण करवाया जिसमे लकड़ी के स्थान पर मंदिर में पत्थर का प्रयोग किया गया। सिंह विष्णु के दरबार में किरातार्जुनीयम के लेखक भारवि रहते थे। राजाओं की सहायता के लिए मंत्रिपरिषद थी जिसे राहस्यदिकदास कहा जाता था।

महेंद्रवर्मन प्रथम (600 - 630 ई०)

सिंह विष्णु के पश्चात महेंद्रवर्मन शाषक बने 600 से 630 ई० तक शासन किया। महेंद्र वर्मन ने पत्थर को काट कर मंदिर निर्माण की कला को प्रारंभ करवाया। महेंद्रवर्मन ने मत्तविलास प्रहसन नामक ग्रंथ की रचना किया। इन्होंने जैन धर्म को त्याग कर शैव धर्म को स्वीकार किया।

नरसिंहवर्मन प्रथम (630 से 668 ई०)

इसके पश्चात नरसिंह वर्मन प्रथम शाषक बने 630 से 668 ई० तक इन्होंने शाषण किया। इन्होंने चालूक शासक पुलकेशिन द्वितीय को परास्त किया और विजय के उपलक्ष्य में वातापीकोंड (वातापी को जीतने वाला) और महामल्ल की उपाधि धारण किया। नरसिंह वर्मन को पुनः चालूक शासक विक्रमादित्य ने परास्त कर वातापी पर अधिकार कर लिया। नरसिंहवर्मन प्रथम ने महाबलीपुरम का एकाश्म मंदिर जिसे रथ कहा जाता है का निर्माण करवाया। रथ मंदिरों में सबसे छोटा द्रोपदी रथ इसमें किसी प्रकार का अलंकार नही मिलता है।

महेन्द्रवर्मन द्वितीय (668 से 670 ई०)

परमेश्वर प्रथम (670 से 680 ई०)

नरसिंह वर्मन द्वितीय (704 से 728 ई०)

पुनः नरसिंह वर्मन द्वितीय शासक बने। ये एक शांतिप्रिय शासक थे इनके समय काशी में साहित्य और कला का काफी विकास हुआ और अनेकों मंदिरों का निर्माण करवाया गया। अरबों का भारत पर आक्रमण के समय नरसिंह वर्मन द्वितीय पल्लव का शाषक था। नरसिंह वर्मन द्वितीय ने राजासिंह (राजाओ का सिंह), शंकरभक्त और आगमप्रिय (शास्त्रों का प्रेमी) की उपाधि धारण किया।
दशकुमाचरित के रचनाकार दण्डी, नरसिंह वर्मन द्वितीय के दरबार मे रहते थे। कांची के पंडित वात्स्यायन ने न्यायभाष्य की रचना किया था। पल्लवों के समय कांची ज्ञान और शिक्षा का प्रशिद्ध केंद्र था। नरसिंह वर्मन द्वितीय ने एक नया शैली चलाया जो राजसिंह शैली के नाम से विख्यात है। नरसिंह वर्मन द्वितीय ने कांची में कैलाश मंदिर का निर्माण करवाया यह मंदिर राजसिंघेश्वर मंदिर के नाम से विख्यात है इसके अलावे महाबलीपुरम का शोर मंदिर भी बनवाया। कांची के कैलाश मंदिर के निर्माण से भारत में द्रविड़ स्थापत्य कला की शुरुआत हुई । महाबलीपुरम का शोर मंदिर इसका उदाहरण है। दक्षिण भारत मे पल्लव शासकों ने ही मंदिर निर्माण की प्रथा को आरंभ किया।
नंदीवर्मन द्वितीय ( 731 से 795 ई० )
नंदी वर्मन द्वितीय के समय कांची का मुक्तेश्वर का मंदिर और वैकुंठ का पेरुमल का मंदिर बनवाया गया। इन्हीं के समय दक्षिण भारत में वैष्णव संत अलवर का उदय हुआ।

अपराजित ( 879 से 897 ई० )

पल्लव वंश के अंतिम शासक अपराजित थे इनको चोल शासक आदित्य प्रथमं ने परास्त कर पल्लव पर आधिपत्य कायम कर लिया।
बोधिधर्म इसी राजवंश का था जिसने ध्यान योग को चीन में फैलाया।

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