कुषाण वंश | Kushan Empire

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कुषाण वंश | Kushan Empire :

प्राचीन भारतीय इतिहास में विदेशी आक्रमणकारियों में सबसे आखिर में, पहलव बाद को कुषाण भारत आए। कुषाण चीन के यूची एवं तोखरी जाति के थे। मंगोलिया का कोवी प्रदेश कुषाणों का मूल निवास स्थान था। भारत में यह 5 शाखओं में विभक्त हो गए।


कुजुल कडफिसेस (Kujula Kadphises)

यूची जाति के प्रथम शासक कुजुल कडफिसेस या कडफिसेस प्रथम था। इन्होंने रोमन सिक्के का नकल करके तांबे का सिक्का जारी किया। कुजुल कडफिसेस कुषाण वंश का भारत में संस्थापक था।


विम कडफिसेस (Vima Kadphises)

कुजुल कडफिसेस पश्चात विम कडफिसेस या कडफिसेस द्वितीय शासक बना। इन्हें भारत में कुषाण साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। इनका साम्राज्य पर्शिया से लेकर मथुरा (यूपी) तक फैला हुआ था। इसने सबसे अधिक शुद्ध स्वर्ण का सिक्का जारी किया। इसके अलावा तांबा और चांदी का भी सिक्का जारी किया। इसके सिक्के पर एक तरफ शिव नंदी तथा त्रिशूल और दूसरी तरफ महेश्वर लिखा मिलता है। ये शैव धर्म को मानते थे। इनके समय भारत और रोमन सम्राज्य के बीच व्यापार चरमोत्कर्ष पर था। वीम कडफिसेस के मृत्यु के पश्चात दो दशक तक कुषाण का इतिहास अंधकार में रहा। तत्पश्चात कनिष्क शासक बने।


कनिष्क (Kanishka)

कनिष्क कुषाण साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली शासक हुए। अपना राज्यभिषेक 78 ईस्वी में किया। 78 ईस्वी में ही विजय के उपलक्ष्य में एक संवत जारी किया जो शक संवत के नाम से विख्यात है। शक संवत भारत का राष्ट्रीय संवत है। इन्होंने पेशावर या पुरुषपुर को राजधानी बनाया और यहां एक बौद्ध मठ भी बनवाय। दूसरी राजधानी यूपी के मथुरा को बनाया। इनके 12 अभिलेख और बहुत सारे स्वर्ण सिक्का प्राप्त हुए हैं। इन्होंने देवपुत्र की उपाधि धारण किया। मध्य एशिया के प्रश्न पर चीनी शासक होतन के सेनापति बान-चाओ  के साथ खोतान के निकट युद्ध किया पहली सफलता बान-चाओ को दूसरी सफलता कनिष्क को मिली। चीन के तीन क्षेत्र यारकण्ड, खोतन तथा काशगर कनिष्क को को प्राप्त। यहां से दो राजकुमार को भी भारत लाया इन दोनों राजकुमारों ने नाशपाती और आलू की खेती प्रारंभ किया।
कनिष्क ने कश्मीर पर आधिपत्य कायम किया और वहां पर कनिष्कपूर नामक नगर की स्थापना किया। कनिष्क ने  अश्वघोष एवं मत्रीचेत जैसे विद्वान के प्रभाव में आकर बौद्ध धर्म को स्वीकार किया। पार्स्व के कहने पर कश्मीर के कुंडल ग्राम में चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन किया। इस संगति में बौद्ध धर्म दो भागों में बंट गया हीनयान और महायान। कनिष्क महायान वादी थे। अध्यक्ष वसुमित्र और उपाध्यक्ष अश्वघोष थे। कनिष्क ने देवपुत्र और केसरी की उपाधि धारण किया। कनिष्क को द्वितीय अशोक कहा जाता है। कनिष्क के समय साम्राज्य को क्षत्रप और महाक्षत्रप में विभक्त किया गया था। कनिष्क का चीन से ईरान तथा पश्चिम एशिया तक जाने वाला सिल्क मार्ग या रेशम मार्ग पर नियंत्रण कायम होने के कारण व्यापारिक लाभ प्राप्त हुआ। कनिष्क विद्वान शासक थे इनके राज्य कवि अश्वघोष थे।
अश्वघोष ने बुद्धचरित्र, सूत्रालंकार, शारिपुत्र प्रकरण और सुन्दरानन्द की रचना किया । बुद्धचरित्र में महात्मा बुद्ध के जीवन चरित्र का वर्णन है। बुद्ध चरित्र को बौद्ध धर्म का रामायण कहा जाता है। शारिपुत्र प्रकरण 9 अंको का नाटक है। बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र का बौद्ध धर्म में दीक्षित होने का वर्णन है। अश्वघोष की तुलना मिल्टन, गेटे तथा कांट से की जाती है।

अश्वघोष के अलावा कनिष्क के दरबार में नागार्जुन, चरक, वसुमित्र, मत्रीचेत और पार्श्व जैसे विद्वान रहते रहते थे। नागार्जुन ने माध्यमिकसूत्र एवं शून्यवाद की रचना किया। शून्यवाद को सापेक्षवाद भी कहा जाता है। नागार्जुन के माध्यमिक सूत्र से ही आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसीलिए नागार्जुन को भारत का आइंस्टीन कहा जाता है। वसुमित्र ने त्रिपिटक पर महाभारत से लिखा इसे बौद्ध धर्म का विश्वकोश कहा जाता है। चरक राजवैद्य थे इन्होंने चरक संहिता की रचना किया जिसमें औषधियों का वर्णन है।

कनिष्ठ के पुरुषपुर का पेशावर में चैत्यगृह का निर्माण करवाया। कनिष्क के समय दो शैलियों का विकास हुआ, मथुरा शैली एवं गंधार शैली।
मथुरा शैली : मथुरा शैली का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से हुआ है महात्मा बुद्ध की मूर्ति सिर मुंडित है चेहरे पर आध्यात्मिकता है और आशीर्वाद पर आधारित हैसबसे पहले मथुरा कला में महात्मा बुद्ध की मूर्ति बनी। पहला मानव पूजित मूर्ति महात्मा बुद्ध का है।
गंधार शैली : सबसे ज्यादा मूर्ति गंधार कला में बनी है इसमें स्लेटी पत्थर का उपयोग किया गया है। गांधार कला की मूर्ति यूनानी देवता अपोलो से मिलती है इसीलिए इस कला को यूनानी-बौद्ध या इंडो-ग्रीक कला भी कहते हैं। इस कला का प्रधान केंद्र गंधार प्रधान केंद्र गंधार था। यह मूर्ति यथार्थ पर आधारित है और सिर मुंडित नहीं है।

कनिष्क 23 वर्षों तक शासन किया 101 या 102 ईस्वी में देहांत हो गया। कनिष्क के पश्चात उत्तराधिकारी वशिष्ठ हुए और वशिष्ठ के पश्चात हुविष्क शासक बना इनका साम्राज्य मथुरा तक सिमट कर रह गया। इन्होंने बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों को संरक्षण दिया। मथुरा में एक विहार बनवाया कश्मीर में हुस्कपुर नामक नगर की स्थापना किया। इनके समय अमरावती कला का विकास हुआ। प्रधान केंद्र आंध्र प्रदेश था। सफेद संगमरमर का प्रयोग हुआ है।
कुषाण वंश अंतिम शासक वासुदेव द्वितीय थे इन्होंने लगभग 210 से 230 तक शासन किया। ये शैव धर्म को मानते थे। इनके मुद्रा पर शिव तथा नंदी की आकृति नंदी की आकृति मिलती है।
कुषाण के अवशेष पर मथुरा में नाग वंश की स्थापना हुई।  कुषाण के समय में भारत में पगड़ी, अचकन, पतलून, जूता, लंबा कोट तथा पान मसाला विकसित हुआ।



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