गुप्त वंश | Gupta Empire in Hindi

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गुप्त वंश | Gupta Empire in Hindi
गुप्त वंश गुप्त कुषाण के सामंत थे। गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अंत में  प्रयाग के निकट कौशांबी में हुआ। गुप्त वंश के संस्थापक श्रीगुप्त थे। श्री गुप्त ने महाराज की उपाधि धारण किया। श्रीगुप्त ने 240 से 280 ईस्वी तक शासन किया। श्री गुप्त ने मगध के मृगसिखावन में एक वृहद मंदिर का निर्माण करवाया था जिसमें उन्होंने 24 गांव आमदनी को दान में दिया। श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी घटोत्कच हुआ। प्रथम शासक घटोत्कच को माना जाता है। इन्होंने 280 ईस्वी से 319 ईस्वी तक शासन किया। घटोत्कच का उत्तराधिकारी चंद्रगुप्त प्रथम बना।
Guptaempire Samudragupta fin
By Otso Huuska, via Wikimedia Commons

गुप्त वंश के शासक
श्री गुप्त
240 – 280 ई०
पूरु गुप्त
467 – 473 ई०
घटोत्कच
280 – 319 ई०
कुमार गुप्त द्वितीय
473 – 476 ई०
चंद्रगुप्त प्रथम
219 – 235 ई०
बुधगुप्त
476 – 495 ई०
समुद्रगुप्त
235 – 275 ई०
वैन्यगुप्त
495 – 507 ई०
रामगुप्त
375 – 380 ई०
भानुगुप्त
510 – __ ई०
चंद्रगुप्त द्वितीय
380 – 415 ई०
नरसिंह बाल आदित्य
495 – __ई०
कुमारगुप्त प्रथम
415 – 455 ई०
कुमारगुप्त तृतीय
530 – 540 ई०
स्कंधगुप्त
455 – 467 ई०
विष्णु गुप्त
440 – 450 ई०

चंद्रगुप्त प्रथम

घटोत्कच का पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश के वास्तविक संस्थापक थे। इन्होंने राज्याभिषेक के पश्चात 319 या 320 में एक संवत चलाया जो गुप्त संवत के नाम से विख्यात है। इन्होंने महाराजाधिराज की उपाधि धारण किया। राजा रानी प्रकार का सिक्का चलाया जिसमें एक तरफ राजा रानी का चित्र और दूसरी तरफ सिंहवाहिनी देवी यानी दुर्गा देवी का चित्र था। इन्होंने लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया और वैशाली पर नियंत्रण किया। चंद्रगुप्त प्रथम का राज्य पूर्व में मदद से लेकर प्रयाग तक और दक्षिण में मध्य प्रदेश से दक्षिण पूर्वी भाग तक था। चंद्रगुप्त प्रथम का शासनकाल 319 से 335 ईसवी था। चंद्रगुप्त प्रथम का पुत्र समुद्रगुप्त उत्तराधिकारी बना।

समुद्र गुप्त

इनका पुत्र समुद्रगुप्त 335 से 375 ईसवी तक शासन किया। हरिषेण की प्रयाग या इलाहाबाद प्रशस्ति अभिलेख से इनकी जानकारी मिलती है। हरिसेन समुद्रगुप्त के दरबारी कवि थे हरिश्चंद्र प्रयाग या इलाहाबाद प्रशस्ति लेख की रचना किया। प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की विजय अभियान की जानकारी मिलती है। हरिसेन ने प्रयाग प्रशस्ति में इन्हें संपूर्ण पृथ्वी का विजेता बताया है और स्मिथ ने इन्हें भारत का नेपोलियन कहा।
साम्राज्य विस्तार के क्रम में पहले आर्यावर्त के तीन और द्वितीय बार में आर्यावर्त के नौ शासकों को परास्त किया। तमिलनाडु को छोड़कर दक्षिण के 12 शासकों को परास्त किया साथ ही आडविक राज्य को भी जीता। इन्होंने यूपी से लेकर मालवा तक को भी जीता।
पूर्वी भारत में सबसे महत्वपूर्ण जीत बंगाल विजय था। पूर्वी भारत की महत्वपूर्ण बंदरगाह ताम्रलिप्ति पर आधिपत्य कायम हो गया। समुद्रगुप्त के समय श्रीलंका के शासक मेघवर्ण समुद्रगुप्त के अनुशंसा से बोधगया में 172 फीट का बौद्ध मंदिर एवं विहार बनवाया। समुद्र गुप्त ने भारत ही नहीं दक्षिण पूर्व एशिया के शक और कुषाण को भी परास्त किया। विजय उपलक्ष में अश्वमेघ यज्ञ किया और सिक्कों पर अश्वमेध पराक्रम लिखवाया साथ ही अश्वमेघकर्ता की उपाधि धारण किया। ये विद्वान होने के कारण कविराज के रूप में भी विख्यात थे। इन्होंने विक्रमांक की भी उपाधि धारण किया। संगीतज्ञ होने के कारण इन्हें वीणा वादन का शौक था। इनके सिक्कों पर इंहें वीणा बजाते हुए दिखाया गया है। इन्होंने बौद्ध विद्वान वसुबंधु को अपना मंत्री नियुक्त किया था। धर्मनिष्ठ होने के कारण समुद्र गुप्त को धर्म का प्राचीर कहा गया है। इनके समय ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धार हुआ। ये वैष्णव धर्म को मानते थे और विष्णु के भक्त थे। एरण अभिलेख में समुद्र गुप्त की तुलना रघु से किया गया है।

रामगुप्त

समुद्र गुप्त देहांत के पश्चात बड़ा देहांत के पश्चात बड़ा पुत्र रामगुप्त शासक शासक बना। राम गुप्त 375 से 380 तक शासन किया। रामगुप्त शक शासक रुद्र सिंह तृतीय से परास्त हुआ। साम्राज्य की रक्षा हेतु पत्नी ध्रुवस्वामिनी को सुपुर्द किया। छोटा भाई चंद्रगुप्त द्वितीय ने छद्मवेश में रुद्र सिंह तृतीय का वध किया तत्पश्चात बड़े भाई का वध करके भाभी ध्रुवस्वामिनी से विवाह कर लिया।

चंद्रगुप्त द्वितीय

चंद्रगुप्त द्वितीय 380 से 415 तक शासन किया। चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में सभी क्षेत्र में पूर्ण विकास हुआ इसलिय इनके शासनकाल को स्वर्ण युग कहा जाता है। नागवंश की कन्या कुबेर नागा से विवाह किया जिससे प्रभावती का जन्म हुआ। प्रभावती का विवाह वाकाटक शासक रुद्रसेन द्वितीय से हुआ इनके दो पुत्र हुए दिवाकर सेन और दामोदर सेन। रुद्रसेन के देहांत के पश्चात प्रभावती संरक्षिका बनी। अप्रत्यक्ष रूप से वाकाटक पर चंद्रगुप्त द्वितीय का आधिपत्य कायम हो गया।
चंद्रगुप्त द्वितीय ने पाटलिपुत्र के अलावा उज्जैन को दूसरी राजधानी बनाया। उज्जैन स्थित दरबार में कालिदास, अमर सिंह और वराह मिहिर रहते थे। चंद्रगुप्त द्वितीय शक को परास्त कर शकारी की उपाधि धारण किया और चांदी का सिक्का जारी किया तथा विजय के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य की उपाधि धारण किया। भारत में 14 विक्रमादित्य हुए हैं जिनमें चंद्रगुप्त द्वितीय सबसे महत्वपूर्ण विक्रमादित्य हुए। चंद्रगुप्त द्वितीय विष्णु के भक्त थे और परम भागवत की उपाधि धारण किया।
चंद्रगुप्त II के समय चीनी यात्री फाह्यान 399 ईस्वी में भारत की यात्रा किया।
इनके प्रधान सचिव वीरसेन थे इन्होंने उदयगिरि अभिलेख की किया रचना किया। चंद्रगुप्त द्वितीय के समय ब्राह्मण धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था। चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में नवरत्न रहते थे। चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार के नवरत्न इस प्रकार थे – महाकवि कालिदास, वररुचि,  वराह मिहिर, घटकर्पर, बैताल भट्ट, शंकु, धन्वंतरि, क्षपणक और अमर सिंह। इन नवरत्नों में कालिदास, अमर सिंह और वराह मिहिर सबसे प्रमुख थे।

कालीदास - इन सभी में कालिदास का प्रमुख स्थान था इन्होंने 7 ग्रंथों की रचना किया। कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे। कालिदास राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं और कुछ विद्वान उन्हें राष्ट्रीय कवि का स्थान तक देते हैं। अभिज्ञानशाकुंतलम् कालिदास की सबसे प्रसिद्ध रचना है। यह नाटक कुछ उन भारतीय साहित्यिक कृतियों में से है जिनका सबसे पहले यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ था। यह पूरे विश्व साहित्य में अग्रगण्य रचना मानी जाती है। रघुवंश और कुमारसंभव महाकाव्य है जो कालिदास की कृति है। मेघदूत और ऋतुसंहार खंडकाव्य है। मालविकाग्निमित्रम् , विक्रमोर्वशीय और अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक है। सभी ग्रंथों में मेघदूत को विशेष ख्याति मिली और नाटक को में अभिज्ञानशाकुन्तलम् महत्वपूर्ण है। अभिज्ञानशाकुन्तलम् में दुष्यंत और शकुंतला के मिलन विच्छेद और पुनर्मिलन का वर्णन है। कालिदास को भारत का शेक्सपियर कहा कहा जाता है।
वराह मिहिर - वराह मिहिर गणितज्ञ, ज्योतिषाचार्य और खगोलविद थे। इन्होंने पंचसिद्धान्तिका, बृहज्जातकम्, लघुजातक, बृहत्संहिता टिकनिकयात्रा, बृहद्यात्रा या महायात्रा, योगयात्रा या स्वल्पयात्रा, वृहत् विवाहपटल, लघु विवाहपटल, कुतूहलमंजरी, दैवज्ञवल्लभ और लग्नवाराहि की रचना किया।
अमर सिंह - अमर सिंह ने अमरकोश की रचना किया। अमरकोष संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कोष ग्रन्थ है।
शूद्रक - शूद्रक मृच्छकटिकम् की रचना किया। मृच्छकटिकम के अतिरिक्त उन्होने वासवदत्ता, पद्मप्रभृतकाआदि की रचना भी की।
भारवि - भारवि ने किरातार्जुनीय की रचना किया। यह काव्य किरातरूपधारी शिव एवं पांडुपुत्र अर्जुन के बीच के धनुर्युद्ध तथा वाद-वार्तालाप पर केंद्रित है।
आर्यभट्ट - आर्यभट प्राचीन भारत के एक महान ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। उन्होंने आर्यभटीय नामक महत्वपूर्ण ज्योतिष ग्रन्थ लिखा, जिसमें वर्गमूल, घनमूल, समान्तर श्रेणी तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का वर्णन है। आर्यभट्ट नेे शून्य का आविष्कार, पाई का मान दिया। आर्यभट्ट दशमलव में π का मान 4 अंक 3.1416 बताया। इनका 475 में पाटलिपुत्र में जन्म हुआ और 550 में देहांत हो गया।

कुमार गुप्त

चंद्रगुप्त द्वितीय के पश्चात कुमार गुप्त शासक बने महिन्द्रादित्य की उपाधि धारण किया। कुमारगुप्त ने सबसे अधिक स्वर्ण सिक्का चलाया। सिक्का मयूर शैली के थे। कुमारगुप्त को शक्रादित्य भी कहा जाता है। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना भी कुमारगुप्त के समय ही हुआ। कुमार गुुप्त का शासन काल शांति और समृद्धि के लिए जाना जाता है।

स्कन्दगुप्त

कुमारगुप्त के पश्चात स्कंदगुप्त गुप्त शासक बना। इनके समय सौराष्ट्र के गवर्नर चक्रपाणि ने सुदर्शन झील का मरम्मत करवाया। स्कंदगुप्त के समय हुण का आक्रमण हुआ और उन्हें परास्त किया। हुण को म्लेच्छ कहा जाता है। हुण प्रथम शासक विगिन थे और सबसे शक्तिशाली तो तोरमाण थे। स्कंधगुप्त का शासनकाल 455 से 467 ईसवी तक था।
बुधगुप्त को गुप्त साम्राज्य का पुनर्स्थापक माना जाता है। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय में धन दिया। यह बौद्ध धर्म को मानते थे।

नरसिंह बालादित्य के समय गुप्त सम्राट तीन भागों में विभक्त हो गया – मालवा, बंगाल और मगध। नरसिंह बालादित्य ने भी हुण शासक मिहिरकुल को परास्त किया था।
गुप्त शासक भानुगुप्त के एरण अभिलेख जिनमें सती प्रथा का पहली बार उल्लेख किया गया है।
कुमारगुप्त तृतीय के समय मालवा के शासक यशोधर्मन हुण को परास्त कर 532 ईस्वी में एक विजय स्तंभ का निर्माण कराया इनकी जानकारी कुमारगुप्त के मंदसौर अभिलेख से होती है।
गुप्त वंश का अंतिम शासक विष्णुगुप्त थे 540 से 550 ईस्वी तक शासन किया। गुप्त का शासनकाल 240 या 275 से 550 तक था। मुख्य शाखा 467 तथा उसके बाद परवर्ती।
गुप्त के समय साहित्य कला और विद्या का प्रधान केंद्र उज्जैन था। शिव के और नागेश्वर की मूर्ति गुप्तकाल में मिली है। गुप्त काल में ही रामायण एवं महाभारत अस्तित्व में आया। गुप्त काल के मंदिरों में देवगढ़ का दशावतार मंदिर सर्वोत्तम है। अजंता के 16 और 17 गुफा गुप्तकालीन है। 16 और 17 को चित्रशाला कहा जाता है। चित्रकला का नमूना अजंता की गुफा है। गुप्त के समय कर 1/6 था। चांदी के सिक्का को रूपक कहा जाता था। बाघ की गुफा गुप्तकालीन है या मध्य प्रदेश में है।

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