प्राचीन भारतिय इतिहास में होने वाले विदेशी आक्रमण


प्राचीन भारतिय इतिहास में होने वाले विदेशी आक्रमण :

भारत के विभिन्न राज्यों की बीच राजनीतिक एकता की अभाव ने भारत में विदेशी आक्रमणकारियों को आक्रमण करने और लूट-खसोट करने के लिए प्रेरित किया भारत पर पहला आक्रमण विदेशी आक्रमण करने वाले पर्सियन या इरानी थे।

भारत पर ईरानियों का आक्रमन

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साइरस द्वितीय ( Cyrus II )

साइरस द्वितीय ने हख़ामनी वंश या अजमीढ़ साम्राज्य ( Achaemenid Empire या अजमीढ़ साम्राज्य) की स्थापना किया जिसकी राजधानी पर्सी पॉलिश थी। साइरस द्वितीय 559 से 530 ईसा पूर्व तक शासन किया। उन्होंने ज़ेड्रोसिया के रेगिस्तान होते  भारत पर आक्रमण किया इसकी जानकारी टेसियस, स्ट्रैबो और एलियन के लेखों से मिलती है। रोमन लेखक प्लिनी के अनुसार साइरस कपीसा नगरी को नष्ट किया और सिंधु और काबुल के बीच बसी जनजाति अष्टक और अश्वक को परास्त किया।
सायरस द्वितीय का प्रभाव हिन्द महासागर तक फैला था।
साइरस द्वितीय हिंदु कुश पर्वत तथा काबुल घाटी के जनजातियों को भी परास्त किया और 530 इसापूर्व कैस्पियन क्षेत्र में डरबाइक जनजाति से लड़ते हुए मारा गया।
सायरस द्वितीय के मृत्यु के बाद पुत्र  कैंब्रिज द्वितीय शासक बना यह 530 से 522 ईसापूर्व तक शासन किया आंतरिक कलह के कारण भारत पर ध्यान ना दे सका 522 ईसा पूर्व में मृत्यु के बाद दारा प्रथम या डेरियस प्रथम या दराय बाहु 522 से 486 ईसा पूर्व तक शासन किया।

दारा प्रथम ( Darius I )

दारा प्रथम को विश्व अभिलेखों का जनक माना जाता है इनके तीन अभिलेख बेहीस्तुन, पर्शि पॉलिस, नक्श-ऐ-रुस्तम अभिलेख से भारत विजन की जानकारी मिलती है। बेहिस्तुन अभिलेख से पता चलता है कि इसके साम्राज्य में 23 प्रांत थे इनमें हिंद, सतगु और सप्तसिंधु क्षेत्र दारा प्रथम का 20वां प्रांत था। दारा प्रथम के संपूर्ण राजस्व का एक तिहाई भाग 20वां प्रांत से प्राप्त होता था।
517 इसा पूर्व में दारा प्रथम ने अपनी सेना अध्यक्ष स्काईलेक्स को समुद्री मार्ग की खोज हेतु में भेजा इसके जहाजी बेड़ा को को सिंधु क्षेत्र तक भेजा परंतु यह हिन्द महासागर तक जा पहुंचा।
विश्व में समुद्री मार्ग का खोज सर्वप्रथम स्काईलेक्स ने किया।
दारा प्रथम के समय पारसी संप्रदाय अपने  चरमोत्कर्ष पर था।
486 ईसापूर्व दारा प्रथम का देहांत हो गया पुत्र जराक्सिज शासक बना।

क्षयार्षा (ज़रक्सीज / Xerxes I )

ज़रक्सीज 486 से 465 ईसापूर्व तक शासन किया। ज़रक्सीज के समय यूनान एवं इरान के बीच थर्मोपल्ली का युद्ध ( battle of Thermopylae ) हुआ। इस युद्ध में गांधार एवं सिंध के भारतीय सैनिकों ने ईरान (पर्सिया)का सहयोग किया पर हार से बचा नहीं पाये।यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस जिन्होंने हिस्टोरीका की रचना किया उन्होंने इस पुस्तक में थर्मोपल्ली के युद्ध का वृहद रूप से वर्णन है इसीलिए हेरोडोटस को इतिहास का पिता कहा जाता है। 465 ईसापूर्व अंगरक्षक द्वारा ज़रक्सीज की हत्या कर दिया गया। ज़रक्सीज के बाद अयोग्य शासकों का 330 ईसापूर्व तक शासन रहा। अंतिम शासक  डेरियस तृतीय थे। डेरियस तृतीय के समय 331 ईसा पूर्व में सिकंदर का इरान पर आक्रमण हुआ जिसे अर्बेला का संग्राम या गौगेमेला का युद्ध (Battle of Arbela or Gaugamela) कहा जाता है। इस युद्ध में भारतीय क्षेत्र के सैनिक सहयोग के बाद भी डेरियस तृतीय परास्त हुआ और 330 ईसापुर में ईरानी या पर्शिया साम्राज्य पर सिकंदर का आधिपत्य पर कायम हो गया।
इरानियों के संपर्क में आने के कारण पश्चिम भारत में खरोष्ठी लिपि प्रारंभ हुई। खरोष्ठी लिपि ईरान में आरमेइक लिपि से उत्पन्न हुई है। अशोक का मानसेहरा और शाहबाजगढ़ी अभिलेख खरोष्ठी लिपि में है।
भारत में केस प्रक्षालन की प्रथा ईरानियों की देन है। शिलालेख पर राज्यादेश खुदवाना ईरानियों की देन है।
क्षत्रप प्रणाली ईरानियों की देन है। इस प्रणाली को भारत में कुषाणों ने अपनाया।
मुद्राओं का प्रचलन ईरानियों की देन है।
ईरानियों के द्वारा ही भारतीय संपदा के संबंध में जानकारी उपलब्ध करवाई गई जिसके पश्चात यूनानियों का भारत पर आक्रमण हुआ।