जैन धर्म | Jain dharm in Hindi

Mahavir

Jain Dharm in Hindi :

जैन धर्म के प्रवर्तक ऋषवदेव या आदिनाथ थे। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए। अंतिम तीर्थकर वर्धमान महावीर थे इन्हें ही जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। 23वे तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। इनके पिता - अर्श्वसेन, माता - वामादेवी, वंश - इक्ष्वाकु, गृह त्याग 30 वर्ष में, 83 दिन के बाद ज्ञान की प्राप्ति हुई। इन्होंने चार सिद्धांत दिया सत्य, अहिंसा, अस्तेय तथा अपरिग्रह। चार सिद्धांत देने के कारण ये चतुर्थी कहलाएं इनका प्रतीक चिन्ह सर्प फन था। इनके अनुयाई निग्रह कहलाए। प्रमुख शिष्य केसी। 70 वर्ष तक धर्म प्रचार के बाद 100 वर्ष की आयु वर्ष की आयु में पारसनाथ के सम्मेद शिखर पर 717 ईसापूर्व में इन्होंने अपने शरीर का त्याग(निर्वाण) किया। महावीर पार्श्वनाथ के आध्यात्मिक शिष्य थे।

वर्धमान महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व वैशाली के कुंडल ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ था यह ज्ञात्रिक कुल के क्षत्रिय थे माता त्रिशला लिच्छवी नरेश चेतक की बहन थी। बचपन का नाम वर्धमान था। इनकी शादी यशोदा से हुई। यशोदा से अनोजा या प्रियदर्शनी का जन्म हुआ। अनोजा का विवाह जमाली से हुआ और आगे चल कर जमाली महावीर के शिष्य बन गए। इसने ही बाद में जैन धर्म में फूट डाला। 30 वर्ष की अवस्था में माता पिता के गुजर जाने के बाद अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से अनुमति लेकर गृह त्याग किया।

भ्रमण के दौरान नालंदा में मौखिली पुत्र गौशाल इनके शिष्य बने और 6 वर्ष के बाद जैन धर्म को छोड़कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना किया। 12 वर्षों तक कठोर तपस्या करने के जमभिय ग्राम, ऋजु पालिका नदी के तट पर इन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति को विलीन कहा जाता है।अतुल्य पराक्रमी के कारण यह महावीर के नाम से विख्यात हुए। सर्वप्रथम ज्ञान प्राप्ति के बाद पावापुरी में 11 ब्राह्मणों को दीक्षा दिया। इसके बाद चंपा, वैशाली, मिथिला , राजगिरी और श्रावस्ती में 30 वर्षों तक धर्म का प्रचार प्रसार किया। 72 वर्ष की आयु में राजगिरी के निकट पावापुरी में मल्लराज सस्ती पाल के महल में 464 ईसापूर्व में शरीर का त्याग(निर्वाण) किया। वर्धमान महावीर ने पांचवा व्रत ब्रम्हचर्य को जोड़ा।

महावीर ने मोक्ष प्राप्ति के लिए तीन सूत्र दिया –
  1. सम्यक ज्ञान
  2. सम्यकआचरण
  3. सम्यक दर्शन

महावीर की शिक्षा का उद्देश्य आत्मा की परिपूर्णता से है।इन्होंने एक संघ का निर्माण किया। इनके अनुयायियों की संख्या 11 थी जिन्हें गंधार कहा गया। महावीर के मृत्यु के बाद सिर्फ एक अनुयाई जीवित रहा इसका नाम सुधर्मण। महावीर के बाद इन्होंने ही जैन धर्म को संभाला। मौर्य शासके चंद्रगुप्त मौर्य ने भद्रबाहु के कहने पर जैन धर्म का दीक्षा लिया। इन्होंने संस्कृत में कल्पसूत्र की रचना किया इसमें जैन तीर्थंकरों की जीवन का वृतांत है। महावीर के देहांत के 200 वर्षों के बाद तक मगध में अकाल रहा। अकाल के क्रम में भरण पोषण हेतु भद्रबाहु कर्नाटक चले गए हैं और स्तुभद्र मगध नहीं रह गए।इनके वापस आने के बाद जैन धर्म दो भागों में विभक्त हो गया - श्वेताम्बर और दिगम्बर। वस्त्र धारण करने वाले श्वेतांबर और निर्वस्त्र रहने वाले दिगंबर कहलाए। श्वेताम्बर सफेद वस्त्र पहनते है और दिगम्बर नग्न रहते है। जीवो में पहले से व्याप्त कर्म जब समाप्त होने लगता है तो उसे निर्जरा कहते हैं।

जैन धर्म का प्रथम अधिवेशन में 12 नियमों को संकलित किया गया जिसे आगम कहा गया है। इसे मानने वाले शासकों में चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल और उदयन थे। जैन धर्म का प्रधान केंद्र मथुरा एवं उज्जैन था।
द्वितीय जैन संगति का आयोजन गुजरात के बल्लभी में हुआ। अध्यक्षता देवर्धि क्षमा श्रवण ने किया। इस अधिवेशन में श्वेताम्बर द्वारा धर्म शास्त्र को मान्यता प्रदान किया गया।

खारवेल का हाथीगुंफा अभिलेख जैन धर्म का सबसे बड़ा अभिलेख है। दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट वंश के समय जैन धर्म को काफी ख्याति मिली। जैन धर्म अपना उपदेश प्राकृत भाषा में दिया लेकिन ग्रंथ अर्धमागधी भाषा में लिखा गया है। कर्नाटक स्थित श्रवणबेलगोला में अनेको जैन मंदिर है इन में चामुंडा राय द्वारा गोमतेश्वर की प्रतिमा सबसे प्रमुख है।कर्नाटक में स्थापित जैन मठ को वशदी कहते हैं। मध्य प्रदेश स्थित ऋषभदेव या आदिनाथ का मंदिर जैन धर्म का सबसे ऊंचा मंदिर(84 फीट) है। जबकि श्रवणबेलगोला मंदिर 70 फीट है। माउंट आबू का दिलवाड़ा का जैन मंदिर सबसे उत्कृष्ट जैन मंदिर है। चंद्रगुप्त मौर्य दक्षिण भारत में जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया और कर्नाटक के श्रवणबेलगोला मे सल्लेखना या उपवास विधि से शरीर का त्याग किया।

जैन धर्म में ज्ञान की तीन स्रोत है तीन स्रोत है - प्रत्यक्ष, अनुमान और तीर्थंकरों का उपदेश। जैन धर्म में निर्वाण को जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है। जैन धर्म चार भागों में विभक्त है। गृहस्थ जीवन में रहकर जैन धर्म मानने वाले को श्रावक श्राविका कहते हैं और जैन सन्यासी को भिक्षु और भिक्षुणी कहते हैं। महावीर की प्रथम भिक्षुणी चंदना थी। जैन धर्म के महान विद्धवान, हेमंत की महत्वपूर्ण कृति परिशिष्ट परबन है ये चालुक्य शासक जयसिंह सिद्धराज के दरबार में रहते थे।
जैन धर्म का प्रमुख पर्व देव दिवाली है। जैन साहित्य आगम प्रमुख है। महावीर का प्रतीक चिन्ह सिंह तथा ऋषभदेव का साढ़, दूसरे तीर्थंकर का हाथी, तीसरा संभवनाथ का घोड़ा और 23वां पार्श्वनाथ का सर्प था। भद्रबाहु की कल्पसूत्र में जैन भिक्षु और ग्यारह शिस्यों का उल्लेख है। जैन धर्म में न्यायवाद का महत्वपूर्ण स्थान है। महावीर अनीश्वर वादी थे परंतु आत्मा में विश्वास रखते थे। ये पुनर्जन्म में भी विश्वास रखते थे। ये जड़ और चेतना दोनों को मानते थे। आध्यात्मिक विचार सांख्यदर्शन से प्राप्त किया। सप्तभंगी सिद्धांत जैन धर्म से संबंधित है इसे साम्यवाद भी कहते हैं यह ज्ञान से संबंधित है।

महावीर की मृत्यु के बाद प्रथम उपदेशक सुधरमन बने लेकिन सबसे ज्यादा प्रचार-प्रसार संभूति विजय और भद्रबाहु ने किया। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष जैन संयासी बन गए थे और उन्होंने रत्न मालिका की रचना किया। जैन तीर्थकरो के लिए चंदेल के द्वारा सबसे ज्यादा मंदिर बनवाया गया। जैन धर्म में मुर्ति पूजा का प्रथम साक्ष्य मथुरा से मिला है। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में महाजनपदों का उल्लेख है। जैन धर्म को व्यापारिक वर्ग में ज्यादा फैलाया। जैन धर्म के संस्थापक ऋषभदेव और अरशिस्ट नेमिनाथ का उल्लेख ऋग्वेद में है और अरशिस्ट कृष्ण से संबंधित थे। 12वीं शताब्दी में यह धर्म जैन धर्म का पतन होने लगा।



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