August 2017 - BHARAT GK - GK in Hindi

28 August 2017

रसायन शास्त्र : परिचय | Chemisty : Introduction in Hindi

Chemical

रसायन शास्त्र (Chemistry) विज्ञान की वह जिसके अंतर्गत पदार्थ के गुण, संगठन, संरचना एवं उनमें होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। रसायन शास्त्र की उत्पत्ति मिस्र में हुई। मिश्र के मिट्टी का रंग काला होने के कारण इनका नाम केमिस्ट्री पड़ा। काली मिट्टी को वहां के लोग केमी या केमिया कहते थे। प्राचीन काल में रसायन विज्ञान को में रसायन को कैमी टेकिंग कहा जाता था। रसायन शास्त्र का जनक Lavoisier को माना जाता है। कार्बनिक रसायन शास्त्र ( Chemisty ) का जनक Friedrich Wöhler को माना जाता है।
रसायन विज्ञान के मुख्यत: तीन शाखाएं हैं –
1. अकार्बनिक (Inorganic) - अकार्बनिक रसायन शास्त्र के अंतर्गत सभी तत्वों एवं उनके यौगिकों का अध्ययन किया जाता है।
2. कार्बनिक (Organic) - कार्बनिक रसायन के अंतर्गत सिर्फ कार्बन के यौगिकों का अध्ययन किया जाता है।
3. भौतिक रसायन शास्त्र (Physical chemistry) - भौतिक रसायन के अंतर्गत रासायनिक अभिक्रियाओं के नियम और उनके सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है।

11 August 2017

बौद्ध धर्म | Bodh Dharma in Hindi



बौद्ध धर्म | Buddhism :

बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध थे। महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल में हुआ । पिता का नाम शुद्धोधन तथा माता महामाया देवी (कोली वंश) थी। जन्म के सात दिनों के बाद माता की मृत्यु हो गई पालन-पोषण मौसी या सौतेली मां प्रजापति गौतमी ने किया। 16 वर्ष की आयु में यशोधरा से विवाह तथा 28 वर्ष की आयु में पुत्र राहुल का जन्म हुआ। महात्मा बुद्ध ने 29 वर्ष की अवस्था मे गृह त्याग किया। महात्मा बुद्ध के गृह त्याग की घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। बुद्ध का घोड़ा का कंटक तथा सारथी चन्ना था।
बुद्ध के प्रथम गुरु आलारकलाम हुए। इन्होंने बुद्ध को संख्या दर्शन की शिक्षा दी इसके बाद रुद्रकरामपुत्र से ज्ञान प्राप्त किया तत्पश्चात कौण्डिय सहित पांच ब्राह्मणों के साथ तपस्या पर बैठे इसमें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई इसके बाद निरंजना ( फल्गु नदी ) के तट पर उरुवेला नामक स्थान पर पीपल वृक्ष के नीचे 35 वर्ष की आयु में वैशाली पूर्णिमा के दिन सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध को तथागत कहा गया। सिद्धार्थ का गोत्र गौतम होने के कारण गौतम बुद्ध का गया।
ज्ञान प्राप्ति के पश्चात सर्वप्रथम उपदेश सारनाथ में 5 ब्राह्मणों को दिया। इस उपदेश को धर्म चक्र प्रवर्तन (धर्म रूपी चक्र का चलना) कहा जाता है। इसके बाद यस नामक व्यापारी को को उपदेश दिया। सबसे अधिक उपदेश कौशल के राजा प्रसेनजित को दिया।
★ बुद्ध सिर्फ बरसात में बेलू वन और जीतू वन में ठहरा करते थे। वेलूवन बिंबिसार ने दिया था और जेतूवन अनाथपिंडक नामक एक व्यपारी ने दिया था।
★ उपदेश के क्रम में तपश्यू और भल्लिका ने बौद्ध धर्म को को ग्रहण किया।
★ बुद्ध सबसे प्रिय शिष्य आनंद थे इनके ही कहने पर महिलाओं को बौद्ध धर्म में प्रवेश मिला।
★ बौद्ध धर्म मे प्रवेश करने वाली पहली महिला प्रजापति गौतमी थी।
★ राजाओं में बिंबिसार, प्रसेनजित, अजातशत्रु और उदयन एवं प्रद्योत थे। उदयन ने बुद्ध को घोषिताराम विहार दान में दिया।
★ 40 वर्ष तक प्रचार-प्रसार करने के बाद 80 वर्ष की आयु में 483 ईसा पूर्व कुशीनगर ( देवरिया ) में बुद्ध का देहांत हो गया। इस घटना को महापरिनिर्वाण कहा जाता है।

बुद्ध चार आर्य सत्य दिए :

  1. संसार दुख में है।
  2. इच्छा दुख का कारण है। 
  3. दुख का निराकरण है। 
  4. इससे मुक्ति के लिए सत्य मार्ग का ज्ञान आवश्यक है। 

दुख के निवारण हेतु आष्टांगिक मार्ग पर बल दिया

  1. सम्यक् दृष्टि 
  2. सम्यक् संकल्प 
  3. सम्यक् वाणी 
  4. सम्यक् कर्मान्त 
  5. सम्यक् आजीव 
  6. सम्यक् व्यायाम 
  7. सम्यक् स्मृति 
  8. सम्यक् समाधि 

महात्मा बुद्ध के पांच प्रतीक चिन्ह थे :

  1. जन्म - कमल और सांड 
  2. गृह त्याग - घोड़ा 
  3. ज्ञान - पीपल (बोधि वृक्ष) 
  4. मृत्यु - स्पुत 
  5. निर्वाण - पद चिन्ह 

बुद्ध का चार महा चिन्ह :

  1. वृद्धावस्था 
  2. रोगी 
  3. सन्यासी 
  4. मृत्यु 
★ बोद्ध धर्म का सांची (मध्य प्रदेश) का स्तूप सबसे महत्वपूर्ण है।
★ बुद्ध ईश्वर को नहीं मानते थे परंतु पुनर्जन्म में विश्वास था।
★ बुद्ध को विष्णु का 9वां अवतार माना जाता है।
★ बुद्ध संघ में प्रवेश को में उपसंपत कहा जाता है।
★ बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जो सन्यास ग्रहण करते हैं उसे भिक्षु तथा भिक्षुणी कहा जाता है।
★ गृहस्थ जीवन में रहकर बौद्ध धर्म मानने वाले को उपासक तथा उपासिका कहा जाता है।
★ बुद्ध के अनुसार निर्वाण इस जन्म में तथा महापरिनिर्वाण मृत्यु के पश्चात मिलता है।
★ त्रिपिटक से बौद्ध धर्म के विषय में विस्तातृ ज्ञान मिलता है। त्रिपिटक पाली भाषा का शब्द है जिसका अर्थ तीन टोकरियाँ होता है। सुत्तपिटक, विनयपिटक तथा अभिधम्मपिटक को त्रिपिटक कहा जाता है।
★ सुत्तपिटक में बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों का वर्णन है।  
★ विनयपिटक में पुरुष व महिला सन्यासियों संबंधी कानूनों का वर्णन है। इसके तीन भाग है : सुत्त विभाग, खुद्दक और परिवार।
★ अभिधम्मपिटक के 7 भाग हैं और उसमें बौद्ध दर्शन (Philosophy) का वर्णन है। यह संस्कृत में लिखा गया है।
★ बोद्ध धर्म का प्रचार पाली भाषा में किया गया है।
★ बौद्ध धर्म के पूजा स्थल को चैत्य कहा जाता है। कार्य संचालन हेतु न्यूनतम सदस्यों की संख्या 20 होती थी इन्हें कोरम कहा जाता है। सभा के प्रस्ताव पथ को अनुशरण कहा जाता है।
★ बौद्ध धर्म में प्रवेश हेतु न्यूनतम आयु 15 वर्ष है। बौद्ध धर्म के तीन प्रमुख अंग हैं – बुद्ध, संघ और धम्म।
★ बौद्ध धर्म को विश्व धर्म अशोक ने बनाया। अशोक का साथ पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने दिया।
★ बौद्ध धर्म सबसे पहले श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत, कंबोडिया, जापान, चीन और थाईलैंड में फैला।
महात्मा बुद्ध को एशिया की रौशनी (Light of Asia) कहां जाता है।
★ बुद्ध संघ और धम्म को त्रिरत्न कहा जाता है।
★ बुद्ध ने मध्यम मार्ग अपनाया, कर्मकांड और जातिवाद का विरोध किया। कर्मकांड के विरुद्ध ही बोद्ध धर्म और जैन धर्म का विकास हुआ।

बौद्ध संगीति (Buddhist councils)

महात्मा बुद्ध के देहांत के बाद उनके उपदेशों को संग्रहित करने, उनका पाठ करने आदि जैसे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बौद्ध संगीति की शुरुआत की गई संगीति का अर्थ साथ साथ गाना होता है। बौद्ध संगति को धम्म संगीति भी कहा जाता है। कुल चार बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ।

प्रथम बौद्ध संगीति (First Buddhist council)

प्रथम बौद्ध संगीति 483 ईसा पूर्व अजातशत्रु के शासनकाल में राजगृही के सप्तकर्णी गुफा में हुई जिसकी अध्यक्षता महाकश्यप ने किया इस बौद्ध संगति में 500 भिक्षुओं ने भाग लिया। इस संगति में आनंद के द्वारा सुत्त पिटक और रुपाली के द्वारा विनयपिटक की स्थापना की गई।
★ खुद्दक निकाय 15 ग्रंथों का संकलन है। इसमें थेरीगाथा की रचना 100 भिक्षुणियों ने मिलकर किया।
★ जातक कथा बुद्ध के पुनर्जन्म पर आधारित है।

द्वितीय बौद्ध संगीति (Second Buddhist council)

द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ईसा पूर्व कालाशोक के शासनकाल में वैशाली में हुआ। यह संगीति आचरण संबंधी मतभेद को दूर करने के लिए हुआ। इस संगीति में भिक्षु दो संप्रदाय में विभक्त हुए – थेरावादी तथा सर्वास्तिवादी।

तृतीय बौद्ध संगीति (Third Buddhist council)

तृतीय बौद्ध संगीति 255 से 250 ईसा पूर्व में अशोक के शासनकाल में पाटलीपुत्र में हुआ। इस संगीति की अध्यक्षता मोगलीपुत्र तिस्स ने किया। इस संगति में स्थिरवाद का प्रभुत्व रहा क्योंकि अध्यक्ष मोगली पुत्र तिस्स का समर्थन था। इन्होंने अभिधम्मपिटक की रचना की यह संस्कृत में है। अभिधम्मपिटक को कथा वस्तु भी कहा जाता है। अभिधम्मपिटक में धर्म सिद्धांत की व्याख्या दार्शनिक आधार पर किया गया था।

चथुर्थ बौद्ध संगीति (Fourth Buddhist Councils)

चतुर्थ बौद्ध संगीति कनिष्क के शासनकाल में 78 ईसवी में कश्मीर में हुआ जिसकी अध्यक्षता वसुमित्र या अश्वघोष ने किया। इस संगीति में महासांगीक का बोलबाला रहा। वसुमित्र ने विभाषा शास्त्र नामक ग्रंथ लिखा। इस संगति में बौद्ध धर्म दो भागों में विभक्त हो गए हीनयान तथा महायान।
★ महायान वादी मानव के रुप में महात्मा बुद्ध की पूजा प्रारंभ किया।
★ हीनयान आगे चलकर दो भागों में विभक्त हो गया। महायान भी दो भागों में विभक्त हो गया - शून्यवाद और विज्ञान वाद। शून्यवाद को सापेक्षवाद भी कहा जाता है।

★ नागार्जुन ने माध्यमिक सूत्र की रचना की थी। सातवीं शताब्दी में तीसरा संप्रदाय ब्रज यान का विकास हुआ। ब्रज यान में पंचरक्षा को बीमारियों से रक्षा करने वाला माना गया है।
★ नागसेन ने पाली भाषा में मिलिंदपन्हो ग्रंथ की रचना किया।
★ वसुमित्र द्वारा रचित महाविभाष को बौद्ध धर्म का विश्वकोश कहा जाता है।
★ अश्वघोष द्वारा लिखा गया बुद्धचरित्र को बौद्ध धर्म का महाकाव्य कहा जाता है।
★ कनिष्क के समय बुद्ध की मूर्ति की पूजा प्रारंभ हुआ।
★ बुद्ध की प्रारंभिक मूर्ति मथुरा कला में बनी थी। सबसे अधिक मूर्ति गंधार कला में बनी है यह कला अध्यात्मिकता पर आधारित है और अमरावती कला में स्वेत संगमरमर उपयोग किया गया है।
★ सर्वप्रथम बौद्ध वृक्ष को अशोक की पत्नी ने कटवा दिया। दूसरा वृक्ष बंगाल के शासक शशांक ने कटवाया तीसरा आंधी में गिर गया।
★ पंचशील का सिद्धांत पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिया था यह बौद्ध धर्म की देन है।

बौद्ध धर्म का पतन :

13 वी शताब्दी में भारत में बौद्ध धर्म का पतन हो गया, पतन में पाल शासक धर्मपाल का हाथ था।

वैशाख पूर्णिमा बोद्धों का सार्वधिक पवित्र त्योहार है। वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। गौतम बुद्ध का जन्म, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति और महापरिनिर्वाण की घटना वैशाख पूर्णिमा के दिन ही घाटी थी इसीलिए बौद्ध धर्मावलंबियों के द्वारा यह दिन सर्वाधिक पवित्र त्योहार की तरह मनाया जाता है।

6 August 2017

जैन धर्म | Jain dharm in Hindi

Mahavir

Jain Dharm in Hindi :

जैन धर्म के प्रवर्तक ऋषवदेव या आदिनाथ थे। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए। अंतिम तीर्थकर वर्धमान महावीर थे इन्हें ही जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। 23वे तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। इनके पिता - अर्श्वसेन, माता - वामादेवी, वंश - इक्ष्वाकु, गृह त्याग 30 वर्ष में, 83 दिन के बाद ज्ञान की प्राप्ति हुई। इन्होंने चार सिद्धांत दिया सत्य, अहिंसा, अस्तेय तथा अपरिग्रह। चार सिद्धांत देने के कारण ये चतुर्थी कहलाएं इनका प्रतीक चिन्ह सर्प फन था। इनके अनुयाई निग्रह कहलाए। प्रमुख शिष्य केसी। 70 वर्ष तक धर्म प्रचार के बाद 100 वर्ष की आयु वर्ष की आयु में पारसनाथ के सम्मेद शिखर पर 717 ईसापूर्व में इन्होंने अपने शरीर का त्याग(निर्वाण) किया। महावीर पार्श्वनाथ के आध्यात्मिक शिष्य थे।

वर्धमान महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व वैशाली के कुंडल ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ था यह ज्ञात्रिक कुल के क्षत्रिय थे माता त्रिशला लिच्छवी नरेश चेतक की बहन थी। बचपन का नाम वर्धमान था। इनकी शादी यशोदा से हुई। यशोदा से अनोजा या प्रियदर्शनी का जन्म हुआ। अनोजा का विवाह जमाली से हुआ और आगे चल कर जमाली महावीर के शिष्य बन गए। इसने ही बाद में जैन धर्म में फूट डाला। 30 वर्ष की अवस्था में माता पिता के गुजर जाने के बाद अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से अनुमति लेकर गृह त्याग किया।

भ्रमण के दौरान नालंदा में मौखिली पुत्र गौशाल इनके शिष्य बने और 6 वर्ष के बाद जैन धर्म को छोड़कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना किया। 12 वर्षों तक कठोर तपस्या करने के जमभिय ग्राम, ऋजु पालिका नदी के तट पर इन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति को विलीन कहा जाता है।अतुल्य पराक्रमी के कारण यह महावीर के नाम से विख्यात हुए। सर्वप्रथम ज्ञान प्राप्ति के बाद पावापुरी में 11 ब्राह्मणों को दीक्षा दिया। इसके बाद चंपा, वैशाली, मिथिला , राजगिरी और श्रावस्ती में 30 वर्षों तक धर्म का प्रचार प्रसार किया। 72 वर्ष की आयु में राजगिरी के निकट पावापुरी में मल्लराज सस्ती पाल के महल में 464 ईसापूर्व में शरीर का त्याग(निर्वाण) किया। वर्धमान महावीर ने पांचवा व्रत ब्रम्हचर्य को जोड़ा।

महावीर ने मोक्ष प्राप्ति के लिए तीन सूत्र दिया –
  1. सम्यक ज्ञान
  2. सम्यकआचरण
  3. सम्यक दर्शन

महावीर की शिक्षा का उद्देश्य आत्मा की परिपूर्णता से है।इन्होंने एक संघ का निर्माण किया। इनके अनुयायियों की संख्या 11 थी जिन्हें गंधार कहा गया। महावीर के मृत्यु के बाद सिर्फ एक अनुयाई जीवित रहा इसका नाम सुधर्मण। महावीर के बाद इन्होंने ही जैन धर्म को संभाला। मौर्य शासके चंद्रगुप्त मौर्य ने भद्रबाहु के कहने पर जैन धर्म का दीक्षा लिया। इन्होंने संस्कृत में कल्पसूत्र की रचना किया इसमें जैन तीर्थंकरों की जीवन का वृतांत है। महावीर के देहांत के 200 वर्षों के बाद तक मगध में अकाल रहा। अकाल के क्रम में भरण पोषण हेतु भद्रबाहु कर्नाटक चले गए हैं और स्तुभद्र मगध नहीं रह गए।इनके वापस आने के बाद जैन धर्म दो भागों में विभक्त हो गया - श्वेताम्बर और दिगम्बर। वस्त्र धारण करने वाले श्वेतांबर और निर्वस्त्र रहने वाले दिगंबर कहलाए। श्वेताम्बर सफेद वस्त्र पहनते है और दिगम्बर नग्न रहते है। जीवो में पहले से व्याप्त कर्म जब समाप्त होने लगता है तो उसे निर्जरा कहते हैं।

जैन धर्म का प्रथम अधिवेशन में 12 नियमों को संकलित किया गया जिसे आगम कहा गया है। इसे मानने वाले शासकों में चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल और उदयन थे। जैन धर्म का प्रधान केंद्र मथुरा एवं उज्जैन था।
द्वितीय जैन संगति का आयोजन गुजरात के बल्लभी में हुआ। अध्यक्षता देवर्धि क्षमा श्रवण ने किया। इस अधिवेशन में श्वेताम्बर द्वारा धर्म शास्त्र को मान्यता प्रदान किया गया।

खारवेल का हाथीगुंफा अभिलेख जैन धर्म का सबसे बड़ा अभिलेख है। दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट वंश के समय जैन धर्म को काफी ख्याति मिली। जैन धर्म अपना उपदेश प्राकृत भाषा में दिया लेकिन ग्रंथ अर्धमागधी भाषा में लिखा गया है। कर्नाटक स्थित श्रवणबेलगोला में अनेको जैन मंदिर है इन में चामुंडा राय द्वारा गोमतेश्वर की प्रतिमा सबसे प्रमुख है।कर्नाटक में स्थापित जैन मठ को वशदी कहते हैं। मध्य प्रदेश स्थित ऋषभदेव या आदिनाथ का मंदिर जैन धर्म का सबसे ऊंचा मंदिर(84 फीट) है। जबकि श्रवणबेलगोला मंदिर 70 फीट है। माउंट आबू का दिलवाड़ा का जैन मंदिर सबसे उत्कृष्ट जैन मंदिर है। चंद्रगुप्त मौर्य दक्षिण भारत में जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया और कर्नाटक के श्रवणबेलगोला मे सल्लेखना या उपवास विधि से शरीर का त्याग किया।

जैन धर्म में ज्ञान की तीन स्रोत है तीन स्रोत है - प्रत्यक्ष, अनुमान और तीर्थंकरों का उपदेश। जैन धर्म में निर्वाण को जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है। जैन धर्म चार भागों में विभक्त है। गृहस्थ जीवन में रहकर जैन धर्म मानने वाले को श्रावक श्राविका कहते हैं और जैन सन्यासी को भिक्षु और भिक्षुणी कहते हैं। महावीर की प्रथम भिक्षुणी चंदना थी। जैन धर्म के महान विद्धवान, हेमंत की महत्वपूर्ण कृति परिशिष्ट परबन है ये चालुक्य शासक जयसिंह सिद्धराज के दरबार में रहते थे।
जैन धर्म का प्रमुख पर्व देव दिवाली है। जैन साहित्य आगम प्रमुख है। महावीर का प्रतीक चिन्ह सिंह तथा ऋषभदेव का साढ़, दूसरे तीर्थंकर का हाथी, तीसरा संभवनाथ का घोड़ा और 23वां पार्श्वनाथ का सर्प था। भद्रबाहु की कल्पसूत्र में जैन भिक्षु और ग्यारह शिस्यों का उल्लेख है। जैन धर्म में न्यायवाद का महत्वपूर्ण स्थान है। महावीर अनीश्वर वादी थे परंतु आत्मा में विश्वास रखते थे। ये पुनर्जन्म में भी विश्वास रखते थे। ये जड़ और चेतना दोनों को मानते थे। आध्यात्मिक विचार सांख्यदर्शन से प्राप्त किया। सप्तभंगी सिद्धांत जैन धर्म से संबंधित है इसे साम्यवाद भी कहते हैं यह ज्ञान से संबंधित है।

महावीर की मृत्यु के बाद प्रथम उपदेशक सुधरमन बने लेकिन सबसे ज्यादा प्रचार-प्रसार संभूति विजय और भद्रबाहु ने किया। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष जैन संयासी बन गए थे और उन्होंने रत्न मालिका की रचना किया। जैन तीर्थकरो के लिए चंदेल के द्वारा सबसे ज्यादा मंदिर बनवाया गया। जैन धर्म में मुर्ति पूजा का प्रथम साक्ष्य मथुरा से मिला है। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में महाजनपदों का उल्लेख है। जैन धर्म को व्यापारिक वर्ग में ज्यादा फैलाया। जैन धर्म के संस्थापक ऋषभदेव और अरशिस्ट नेमिनाथ का उल्लेख ऋग्वेद में है और अरशिस्ट कृष्ण से संबंधित थे। 12वीं शताब्दी में यह धर्म जैन धर्म का पतन होने लगा।



5 August 2017

नंद वंश | Nanda Empire in Hindi



नंद वंश के संस्थापक महापद्यनन्द या उग्रसेन थे। ये शूद्र थे।
इन्हें परशुराम के समान क्षत्रियों का नाश करने वाला बताया गया है। इन्होंने एक छत्र राज स्थापित किया इसलिए इन्हें एकराट भी कहा गया है। इन्होंने पांचाल, कौशल, कलिंग, कुरु और अवंती पर नियंत्रण स्थापित किया। इनका साम्राज्य दक्षिण में विद्यांचल तक फैला था। कलिंग विजय के बाद वहां एक नहर निर्माण करवाया।
इनकी मृत्यु के पश्चात् इन के आठ पुत्रों में धनानंद अंतिम और सबसे शक्तिशाली थे। यूनानी लेखक धनानंद को अग्रमीज कहते थे। इनके पास असीम संपत्ति और विशाल सेना थी। ऐसा माना जाता है कि उनके पास दो लाख पैदल सेना 20000 अश्वारोही 2000 रथ तथा 3000 हाथी था। इनके सेनापति भट्ट साल था। ऐसा माना जाता है कि 80 करोड़ की संपत्ति राजगीर के पहाड़ी में  छुपाया था। इन्होंने चाणक्य को अपमानित किया था इसीलिए चाणक्य चंद्रगुप्त मौर्य की सहायता से धनानंद का अंत कर दिया और मौर्य वंश की स्थापना किया।

2 August 2017

महाजनपद | Mahajanapadas in Hindi


महाजनपद | Mahajanapadas in Hindi :

प्राचीन भारत मे राज्य या प्रशासनिक इकाईयों को महाजनपद कहते थे। महाजनपद का काल 600 से 300 ई० पूर्व माना जाता है। अंगुत्तर निकाय और भगवती सूत्र में 16 महाजनपद की जानकारी मिलती है। जनपद में दो प्रकार के राज्य होते थे, गणतंत्र और राजतंत्र। गणतंत्र में वज्जि सबसे प्रमुख था तथा राजतंत्र में मगध, वत्स, अवंति तथा कौशल प्रमुख थे।

16 महाजनपद :

1. अंग महाजनपद – अंग की राजधानी चंपा थी, प्राचीन नाम - मालिनी पहचान - भागलपुर तथा मुंगेर, निर्माणकर्ता- महागोविंद।
2. मगध महाजनपद – राजधानी राजगृह थी। यह राज्य 5 पहाड़ियों से घिरा हुआ था। शासक बिंबिसार ने अंग के शाषक ब्रह्मदत्त को परास्त कर मगध में मिला लिया।
3. वज्जि महाजनपद – राजधानी मिथिला थी। सबसे शक्तिशाली लिच्छवी था। राजधानी वैशाली पहचान - मुजफ्फरपुर के बसाढ़ जिला। यह विश्व का सबसे पुराना गणतंत्र है। जबकि विदेह की पहचान नेपाल के जनकपुर से होती है।
4. मल्ल महाजनपद – राजधानी - कुशीनगर, पहचान - देवरिया जिला के केशिया। महात्मा बुद्ध का 483 ईसा पूर्व में यहां देहांत हुआ था।
5. काशी महाजनपद – राजधानी - वाराणसी। काशी और कौशल में संबंध - कौशल नरेश कंस की सफलता अजातशत्रु के समय काशी मगध का अंग बन गया।
6. कोसल महाजनपद– राजधानी श्रावस्ती।
7. वत्स महाजनपद – राजधानी - कौशांबी, हस्तिनापुर के शाषक निचक्षु।
8. कुरु महाजनपद – राजधानी इंद्रप्रस्थ थी।
9. पांचाल महाजनपद – राजधानी - अहिच्छत्र, दक्षिण की काम्पिल्य।
10. मत्स्य महाजनपद – राजधानी विराटनगर (राजस्थान)।
11. शूरसेन महाजनपद – राजधानी - मथुरा।

12. अश्मक या अस्सक महाजनपद – राजधानी - पोतन। यह दक्षिण भारत भारत का एकमात्र राज था।
13. अवंती महाजनपद – इसकी दो राजधानी थी, उज्जैनी तथा माहिष्मती।
14. गांधार महाजनपद – राजस्थानी - तक्षशिला, वर्तमान पेशावर।
15. कंबोज महाजनपद – रायपुर का हाटक, यह क्षेत्र उच्च किस्म के घोड़े के लिए विख्यात था।
16. चेदि महाजनपद – राजस्थानी - सूक्तिमति, वर्तमान - बुंदेलखंड।वज्जि संघ सबसे बड़ा होने के साथ यहां न्यायालय की संख्या 8 थी।
महाजनपदों के विनाश का मुख्य कारण उच्च पदों का वंशानुगत होना माना जाता है।

मगध महाजनपद

मगध  प्राचीन शासक वृहदत थे, राजधानी - गृहब्रज। इसके पुत्र जरासंघ सबसे शक्तिशाली शासक हुए। इसे महाबली, महाबहु तथा देवेंद्र कहा गया है। कृष्ण ने भीम की सहायता से मल्ल युद्ध में जरासंध का वध कराया। अंतिम शासक रिपुंजय थे इनकी हत्या इनके मंत्री कुलीग ने कर दिया और पुत्र बालक को गद्दी पर बैठाया। इनके सामंत भट्टीय ने बालक की हत्या कर अपने पुत्र बिंबिसार को मगध की गद्दी पर बैठाया ये हर्यक जाति के थे इनका वंश हर्यक वंश कहलाया। 544 ईसा पूर्व बिंबिसार मगध की गद्दी पर बैठा और 492 ईसा पूर्व तक शासन किया। इन्होंने विवाह पद्धति के आधार पर मैत्री संबंध स्थापित किया। इन्होंने चार शादियां की।
  1. चेतक की पुत्री चेतना या छलना।
  2. कौशल नरेश  की बहन महाकौशला (दहेज में काशी मिला)।
  3. पंजाब के भद्र कुल की राजकुमारी क्षेमा
  4. विदेह राजकुमारी वासवी।

महावज्ञ में बिंबिसार के 500 रानियों का उल्लेख है। बिंबिसार साम्राज्य विस्तार के क्रम में अंग पर आक्रमण किया और शासक ब्रम्हदत्त को परास्त कर अंग को मगध में मिला लिया। अवंती के शक्तिशाली होने के कारण बिंबिसार अपने राज्य से जीवक को अवंती नरेश प्रद्योत के दरबार में भेजकर संबंध स्थापित किया।
बिंबिसार बुद्ध के समकालीन थे तथा बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया। बिंबिसार ने  महात्मा बुद्ध को बेलूवन नामक उद्यान दान में दिया। इनके समय कर सामान्यता कर 1/16 था। बिंबिसार धर्म राज के नाम से विख्यात थे। इनके समय प्रसिद्ध वास्तुकार महागोविंद रहते थे। 52 वर्षों तक शासन करने के पश्चात पुत्र अजातशत्रु ने इनका वध कर सत्ता ले लिया। अजातशत्रु 493 से 407 ई० पूर्व तक शासन किया। ये कुलीग के नाम से जाने जाते थे। साम्राज्य विस्तार के क्रम में सर्वप्रथम कौशल नरेश ने प्रसेनजीत को परास्त किया और उनकी पुत्री वजीरा से विवाह किया तथा काशी पुनः वापस मिला। तत्पश्चात अंग को अपने साम्राज्य में मिलाया।

अजातशत्रु

अजातशत्रु ने वज्जि संघ पर नियंत्रण हेतु दो हथियारों का उपयोग किया रथ भूषण तथा महाशिला कंटक। अवन्ति के आक्रमण से बचने के लिए राजगीर में एक किला का निर्माण करवाया। पहले यह जैन धर्म को मानते थे बाद में बौद्ध धर्म को अपना लिया।
अजातशत्रु के शाषन के 8वें वर्ष (483 ईसा पूर्व) पहली बौद्ध संगति का आयोजन राजगीर की सप्तकर्णी गुफा हुआ।
अजातशत्रु 32 वर्ष तक शासन किया।
407 ईसा पूर्व में उनके पुत्र उदयन ने उनकी हत्या कर सत्ता संभाला तथा 407 से 444 ईसा पूर्व तक शासन किया।
ये शासक बनने से पहले चंपा के गवर्नर थे। उदयन पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया और यहां चैत्यगृह का निर्माण करवाया।

उदयन की हत्या अवंती नरेश के गुप्तचर के द्वारा किया गया।
इनके 3 पुत्र थे अनिरुद्ध, मुंडक, नाग दशक। तीनों मिलकर 444 ईसा पूर्व से 412 इसापुर तक शासन किया।
इस वंश के अंतिम शासक नागदशक थे । इनके सामंत शिशुनाग ने इनका अंत करके शिशुनाग वंश की स्थापना किया(412 से 344 ईसा पूर्व)। शिशुनाग को पुराण में क्षत्रिय कहा गया है तथा महावंश में लिच्छवी राजा के वेश्या से उत्पन्न संतान बताया गया है। सम्राज्य विस्तार की क्रम में अवंती वर्धन को परास्त किया तत्पश्चात वत्स और कौशांबी को अपने अधीन किया। इन्होंने वैशाली को दूसरी राजधानी बनाया इन्ही के समय वैशाली वैभव का केंद्र था।
शिशुनाग की मृत्यु के बाद उनका पुत्र कालाशोक या ककवर्ण वैशाली से पुनः पाटलिपुत्र आया। कालाशोक को 336 ईसा पूर्व में मार दिया गया। इनके दशों पुत्र ने 22 वर्षों तक शासन किया। अंतिम शासक नंदिवर्धन था।