वैदिक काल | Vedic period in Hindi

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Vedik Period in Hindi :

वेदों से जानकारी मिलने के कारण से हम वैदिक काल कहते हैं। इसका समय 1500 से 600 ईसा पूर्व माना जाता है। वैदिक काल के प्रवर्तक आर्य थे इसलिए इस सभ्यता को आर्य सभ्यता भी कहते हैं। संस्कृत में आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ या उत्तम होता है। पंडित गंगानाथ झा के अनुसार आर्य का निवास स्थान ब्रह्म प्रदेश या कुरुक्षेत्र था। बाल गंगाधर तिलक के अनुसार आर्य का निवास स्थान उत्तरी ध्रुव, स्वामी दयानंद के अनुसार तिब्बत, मैक्स मूलर के अनुसार मध्य ऐशिया का बैक्ट्रिया है। आर्य के भारत में आक्रमण की जानकारी वेदों से होती है। वेद संस्कृत के विद् धातु से बना है जिसका अर्थ जानना होता है जबकि वेदों का सामान अर्थ ज्ञान से है। वेद को श्रुति भी कहा गया है। लेखनी कला के विकास के पहले वेद को सुनकर ही याद किया जाता था। वेद चार हैं :
1. ऋग्वेद
2. सामवेद
3. यजुर्वेद
4. अथर्ववेद

ऋग्वेद

सबसे प्रचीन वेद ऋग्वेद है इसकी रचना लगभग 1500 से 1200 ईसापूर्व संभवत: गंगा एवं यमुना के तटीय मैदान में हुई। वेदों की रचना ऋषि कुल तथा उस समय के विदुषी महिलाओं के द्वारा किया गया। वेदों की रचना में योगदान विश्वामित्र, रामदेव, अगस्त ऋषि, भारद्वाज तथा उनकी वंशजों ने ऋग्वेद दिया तथा महिलाओं में लोपामुद्रा, विश्व तारा, बाला तथा भोसा प्रमुख है। ऐसा माना जाता है कि लगभग 12 ऋषि कुलों के द्वारा इसकी रचना की गई।

ऋग्वेद में 10 मंडल तथा सूक्तों की संख्या 1017+11 है इसमें 1017 मौलिक तथा 11 बाद में जोड़ा गया है तथा 10 मंडलों में 2, 3, 4, 5, 6, 7 मौलिक तथा 1, 8, 9, 10 बाद में जोड़ा गया है। तीसरे मंडल के रचनाकार महर्षि विश्वामित्र को माना जाता है। विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र की रचना किया यह सूर्य की उपासना पर आधारित है। ऋग्वेद के तीसरे मंडल में गायत्री मंत्र का उल्लेख है। सातवां मंडल की रचनाकार वशिष्ठ थे इसमें ही दसराज्ञों के युद्ध का उल्लेख है। ऋग्वेद में 10552 या 10600 मंत्रों का उल्लेख है। दसराज्ञ युद्ध परुषणी नदी के तट पर विश्वामित्र की मंत्रणा पर पर दसराज्ञ तथा भरत कुल के राजा सुदास के बीच हुआ था। ऋग्वेद के दसवें मंडल में पुरुष सूक्त का वर्णन है इसी में चारों वर्णों का उल्लेख किया गया है। ऋग्वेद में पाठ करने वाले पुरोहित को होत्रि कहा जाता है। ऋग्वेद के दो ब्रह्मण है, तेत्रीय ब्रह्मण और कौशिकी ब्रह्मण दोनों की रचनाकार महिदास एवं उनके वंशज थे।

सामवेद

ऋग्वेद के बाद सामवेद का स्थान आता है। सामवेद से ही संगीत का विकास हुआ है। साम का अर्थ लय या ताल होता है। सामवेद में वेद में 18010 ऋचाएँ है। सामवेद पद्य में लिखा गया है। सामवेद का गायन सोमयज्ञ के समय उद्गाता करते थे। इस वेद के चार ब्रह्मण है, पंचवीस, षडविष, जेमिनीय तथा क्षादोग्य। पंचवीस को तांड महाब्रह्मण कहते हैं। इस ब्रह्मण में यज्ञ अनुष्ठान का वर्णन है। जैमिनीय ब्राह्मण को तलवकार ब्राह्मण कहते हैं।

यजुर्वेद

तीसरा स्थान यजुर्वेद का आता है यह कर्मकांड का वेद  है इसे गद्य और पद्य दोनों में लिखा गया है इसके रचनाकार महर्षि पतंजलि के ऋषि कुल द्वारा किया गया। यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद के चार संहिता हैै तथा शुक्ल यजुर्वेद का केवल एक संहिता है। कृष्ण यजुर्वेद में यज्ञ विधान का वर्णन है जबकि शुक्ल यजुर्वेद में प्रार्थना का वर्णन है। शुक्ल यजुर्वेद के महत्वपूर्ण शतपथ ब्रह्मण है और कृष्ण यजुर्वेद के तेत्रेय ब्रह्मण है।

अथर्ववेद

चौथा वेद अथर्ववेद है इसके रचनाकार अथर्वा ऋषि थे। इसके 20 भाग तथा 711 सूक्त और 600 मंत्र है। अर्थवेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ गोपथ है। अथर्व वेद में कर्मकांड, जादू टोना, रोग निवारण तथा जन्म-मरण का वर्णन है।

वेदांग

चारों वेद के बाद वेदांग आते हैं इसकी संख्या छः है - शिक्षा कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष, व्याकरण।
1. व्याकरण - व्याकरण में पाणिनि का अष्टाध्याई सबसे प्रमुख है। अष्टाध्याई पर पतंजलि ने भाष्य नामक टीका लिखा।
2. निरुक्त - इसमें वैदिक शब्द की उत्पत्ति का वर्णन है।
3. छंद - इसकी रचना वेद की ठीक-ठीक उच्चारण करने के लिए किया गया है।
4. ज्योतिष - इसमें खगोल विज्ञान और शुभ घड़ी में यज्ञ संपन्न करने के लाभ का वर्णन है।
वास्तविक यजुर्वेद शुक्ल को कहा जाता है।


दर्शन

हिंदू दर्शन छः है :–
1. सांख्य दर्शन - कपिल मुनि
2. योग दर्शन - पतंजलि
3. वैशेषिक दर्शन - कणाद
4. मीमांसा दर्शन - जैमिनी
5. न्याय दर्शन - गौतम
6. वेदांत या उत्तर मीमांसा

सामाजिक व्यवस्था

ऋग्वेद में 21 नदियों का उल्लेख हुआ है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सिंधु नदी तथा सबसे पवित्र सरस्वती नदी है। ऋग्वेद में गंगा का एक बार तथा यमुना का तीन बार प्रयोग हुआ है तथा सागरों में अरब सागर का उल्लेख हुआ है।
आर्य भारत में कई जनों में महत्वपूर्ण भारत एवं कुरु था इनके बीच रावी नदी के जल को लेकर दशराज्ञ का युद्ध हुआ था। युद्ध में भरत कुल के राजा सुदास के जीत तथा कुरु कुत्स की हार हुई। कुरु का नेतृत्व विश्वामित्र ने किया तथा भरत का नेतृत्व वशिष्ठ ने किया था।
आर्य के पश्चात कुरु और भरत मिलकर एक वंश चलाया जिसका नाम  "कुरु" हुआ। कुरु ने पांचाल के साथ मिलकर गंगा के तट पर एक क्षेत्र स्थापित किया यह आर्यावर्थ कहलाया। दशराज्ञ का युद्ध आर्यों के बीच हुआ परंतु मुख्य दुश्मन द्रविड़ थे इन्हें दास बनाया गया।
आर्य मुख्यता पशुपालक थे और गायों को लेकर युद्ध होता था क्योंकि विनिमय का माध्यम गाय ही था।
प्रिय पशु घोड़ा था, जीवन ग्रामीण था। ये लोग मिट्टी के घरों में रहते थे। कृषि गौण व्यवसाय तथा गाय मुख्य व्यवसाय था। पुरोहितों को दान में गाय दिया जाता था। राजा प्रजा से सुरक्षा के बदले बली नामक कर लेते थे यह अन्न के रूप में होता था।


ऋग्वेद की सबसे प्राचीन संस्था विदथ थी । राजा पर नियंत्रण दो सभाएं करती थी। ऋग्वेद में सभा का छः बार तथा समिति का आठ बार प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामिन का उल्लेख हुआ है। पुरोहित युद्ध भूमि में जाते थे, ग्रामीण प्रशासनिक कार्य देखते थे। गुप्तचर को स्पर्स कहा जाता था। समाज का स्वरुप पितृसत्तात्मक था। समाज का राजनीतिक ढांचा का आरोही क्रम इस प्रकार है कुल, ग्राम, विश, जन, राष्ट्र। कुल के प्रधान पुरुष होते थे इसके बाद ग्राम का स्थान आता था आता था। ग्राम का मुखिया ग्रामीण कहलाता था विश का प्रधान विशवपति कहलाते थे। विश मिलकर जन का निर्माण होता था जन का प्रधान राजा या राजन होते थे। ऋग्वेद में जन शब्द का प्रयोग 275 तथा विश का 170 बार हुआ है। व्यवसाय के आधार पर जाति का विभाजन होता था। व्यवसाय के संबंध में ऋग्वेद में कहा गया है कि "मैं कवि हूं पिता वैद्य हैं तथा माँ अन्न पीसने वाली है"। ऋग्वेद में चारागाह के अधिकारी को बृहस्पति, परिवार के प्रधान को कुलम, लड़ाकू दल के प्रधान को ग्रामीण कहा जाता था।

विवाह पद्धति

विवाह का मुख्य उद्देश्य संतान प्राप्ति थी। सामान्यता एक पत्नी रखने की व्यवस्था थी पर कुलीन एक से अधिक पत्नी रख सकते थे। सती प्रथा का प्रचलन नहीं था लेकिन अंतरजातीय विवाह होती थी। विवाह स्वयंवर पद्धति पर आधारित थी अनार्य से विवाह वर्जित था। विवाह में मिला उपहार को "वहतू" कहा जाता था। नियोग प्रथा का प्रचलन था इस प्रथा से विधवा महिलाएं पुत्र की प्राप्ति हेतु ने देवर से विवाह कर सकती थी। विवाह पद्धति को दीर्घात्मा ऋषि ने प्रारंभ करवाया था। शतपथ ब्राह्मण में पत्नी को पति की अर्धांगिनी कहा गया है। ऋग्वेद में महिलाओं की स्थिति अच्छी थी पर राजनीतिक में उनकी भूमिका नहीं होती थी। संपत्ति पर महिलाओं का अधिकार नहीं होता था।


ऋग्वेद में नमक का उल्लेख नहीं हुआ है। गाय के लिए अधन्या (नहीं मारने योग्य) शब्द का प्रयोग हुआ है लेकिन विवाह तथा विशेष अवसर पर गाय का वध किया जाता था। उस समय का मुख्य पेय सोमरस था यह भुजवन पर्वत से किया जाता था। सोमरस का ऋग्वेद 9वें मंडल में वर्णन है। ऐसा माना जाता है कि विवस्तव के पुत्र मनु ने सोमरस तैयार किया था। खास करके सोमरस का उपयोग यज्ञ के समय किया जाता था। उस समय के आर्य सूती एवं ऊनी दोनों वस्त्र पहनते थे। आभूषण का प्रयोग स्त्री तथा पुरुष दोनों करते थे।
ऋग्वेद में नाई को वक्ता कहा गया है। गाय मुख्य व्यवसाय होने के कारण इसे अष्टकर्णी कहा गया है। ऋग्वेद में कृषि का उल्लेख 24 बार हुआ है व्यापारी के लिए "पनी" शब्द का प्रयोग हुआ है। धातु के लिए "निष्क" का प्रयोग हुआ है ताम्बा केलिए अयस का प्रयोग हुआ है।
ऋग्वेद में उस समय के पृथ्वी, अंतरिक्ष तथा आकाश के देवताओं का उल्लेख है।  इंद्र को विश्व स्वामी, युद्ध का देवता तथा पुरंदर भी कहा गया है। इंद्र का प्रमुख अस्त्र वज्र या पन्नी इंद्रानी थी। वरुण को जगत नियामक, देवताओं का पोषक और ऋतू को नियंत्रित करने वाला कहा गया है। इन्हें सूर्य का निर्माता भी कहा गया है। अग्नि का ऋग्वेद में 200 सूक्तों में वर्णन है। पृथ्वी की देवताओं में अग्नि का विशेष महत्व है। रुद्र के सिवा सभी देवताओं को मंगलकारी माना गया है। ऋग्वेद में कृषि योग्य भूमि को उर्वरा या क्षेत्र कहा जाता था। 6, 8, 12 बैलों से हल जोत जाता था। ऋग्वेद में "अर" शब्द का उल्लेख है इसका अर्थ हल था। सिंचाई नहर या कूप से होता था कृषि का प्रयोग 24 बार हुआ है।



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