पाल वंश | Pala Empire

पाल वंश | Pala Empire :

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पाल साम्राज्य मध्यकालीन भारत का एक महत्वपूर्ण शासन था। बंगाल के अराजकता के कारण जनता द्वारा गोपाल को सिंघासन पर बैठाया गया तथा गोंड को राजधानी बनाकर शासन करना प्रारंभ किया। 
इस वंश के वास्तविक संस्थापक धर्मपाल थे। इन्होंने 750 ई० से 810 ई० तक शासन किया। धर्म पाल प्रतिहार शासक वत्सराज और राष्ट्रकूट शासक ध्रुव से परास्त हुआ।
प्रतिहार जब राष्ट्रकूट से संघर्ष कर रहा था तब धर्मपाल ने कन्नौज पर आधिपत्य कायम कर लिया और चक्रायुद्ध कहां का गवर्नर बना दिया तथा विजय उपलक्ष में कन्नौज में एक सभा का आयोजन किया साथ ही परमेश्वर, महाराजाधिराजा, परम भटनागर, उत्तरापथ भटनागर और उत्तरापथ स्वामी की उपाधि धारण किया। बौद्ध धर्म को मानने के कारण धर्मपाल को परम सौराष्ट्र भी कहा गया है। इनके दरबार में बौद्ध विद्वान हरिभद्र रहते थे। इन्होंने भागलपुर के पत्थर घाट में विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना किया। उस समय के प्रचार्य दीपांकर श्रीज्ञा थे।


धर्मपाल ने भगवान मन्नारायन के मंदिर के निर्वहन हेतु 4 गाँव की आमदनी दान में दे दिया।
पाल शासक के दरबार में संध्याकर नंदी ने 'रामचरित' की रचना किया तथा चक्रा पानित ने 'चिकित्सा संग्रह' नामक ग्रंथ की रचना किया।
धर्मपाल नालंदा विश्वविद्यालय को 200 गांव की आमदनी दान में दे दिया जबकि हर्ष ने 100 गांव की आमदनी दान में दिया।
धर्मपाल के पश्चात उनके पुत्र देवपाल ने 1810 से 1850 ई० तक शासन किया। ये पाल वंश के सबसे शक्तिशाली शासक हुए। इसने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया। इन्होंने प्रतिहार शासक मिहिर भोज को भी परास्त किया था। बिहार के ओदंतपुरी में बौद्ध मठ का निर्माण करवाया। इन्हीं के समय जावा के शैलेंद्र वंश के बाल पुत्र देव के अनुरोध पर नालंदा में बौद्ध विहार बनाने के लिए पांच गांव की आमदनी दान में दे दिया। बौद्ध विद्वान वीर देव को नालंदा विहार का अध्यक्ष बनाया गया था।
देवपाल के समय अरब यात्री सुलेमान ने भारत की यात्रा किया। सुलेमान ने राष्ट्रकूट और प्रतिहार में देवपाल को सबसे शक्तिशाली कहा और पाल साम्राज्य को रुहमा(धर्म का रक्षक) कहा। इनके समय पाल साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था।
महिपाल प्रथम को पाल शक्ति का पुनर्स्थापक माना जाता है।
पाल वंश के अंतिम शासक गोविंद पाल को माना जाता है। इस वंश को सेन वंश ने अपने अधीन कर लिया।

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